122 साल पहले हुआ रेलवे ट्रैक का निर्माण
वर्ष 2015 में आखिरी बार चली थी यहां ट्रेन
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। ब्रिटिश काल के दौरान देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए तैयार किए ऐतिहासिक रेल ट्रैक की 800 मीटर पटरी मलबे में दबी है। शिमला रेलवे स्टेशन से पुराने बस स्टैंड के बीच बने इस ट्रैक पर 11 वर्ष पहले तक ट्रेन की सीटी सुनाई देती थी लेकिन रेलवे बोर्ड की अनदेखी और पुल की जर्जर हालत के कारण इसकी मरम्मत नहीं हो पाई। वर्ष 2023 में हुई बारिश के बाद से इस ट्रैक का अधिकांश हिस्सा मलबे की चपेट में है। कालका-शिमला रेलवे ट्रैक का निर्माण 122 साल पहले हुआ था।
अब ऐतिहासिक धरोहर के रूप में कालका से शिमला के बीच महज 96 किलोमीटर का हिस्सा ही सिमटकर रह गया है। कालका-शिमला रेललाइन के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने जुलाई 2008 में इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया था।
वर्तमान में शिमला रेलवे स्टेशन से पुराने बस स्टैंड के बीच बिछी इस पटरी का इस्तेमाल केवल राहगीरों द्वारा पैदल रास्ते के रूप में किया जा रहा है। अब यहां न तो ट्रेन चलती है और न ही इंजन के गुजरने का रास्ता बचा है। वर्ष 2015 में शिमला रेलवे स्टेशन से पुराने बस स्टैंड के बीच आखिरी बार ट्रेन चलाने की अनुमति मिली थी लेकिन इसके बाद आज तक इस रूट पर रेल नहीं दौड़ सकी।
हैरानी की बात यह है कि जिस दौर में कठिन से कठिन भू-भाग पर लकड़ी के स्लीपरों से रेल पटरी बिछाकर इतिहास रच दिया था आज के आधुनिक दौर में रेलवे और प्रशासन 800 मीटर पटरी की मरम्मत नहीं कर पाए हैं। ऐतिहासिक धरोहर के प्रति बरती जा रही अनदेखी इससे साफ झलकती है। गौरतलब है कि कालका-शिमला रेलवे लाइन का इतिहास वर्ष 1847 से शुरू हुआ था। 9 नवंबर 1903 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने इसका उद्घाटन किया था जिसके बाद पहली बार इस ट्रैक पर ट्रेन चली थी।
आलू ढुलाई के लिए बना था एक्सटेंशन स्टेशन
ब्रिटिश सरकार ने शिमला में आलू के बीज के परिवहन को आसान बनाने के लिए पुराने बस स्टैंड पर एक्सटेंशन रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया था। इस स्टेशन को 27 जून 1909 को शुरू किया था। यहां रोजाना मालगाड़ी और पैसेंजर ट्रेन की आवाजाही होती थी जिससे स्थानीय लोगों को काफी सुविधा होती थी। वर्ष 2015 में दो डिब्बों वाली एक छोटी ट्रेन को ट्रायल के तौर पर शिमला स्टेशन से पुराने बस स्टैंड तक चलाया था।
क्या है इतिहास
विश्व धरोहर कालका-शिमला रेल ट्रैक पर 103 सुरंगों और कुल 869 छोटे-बड़े पुलों से होकर ट्रेन गुजरती है। बड़ोग रेलवे स्टेशन पर स्थित 33 नंबर बड़ोग सुरंग इस ट्रैक की सबसे बड़ी सुरंग है। इसकी लंबाई 1143.61 मीटर है। इस रेलमार्ग पर 919 मोड़ हैं, जिनमें सबसे तीखा मोड़ 48 डिग्री का है। इस रेलमार्ग पर कुल 18 स्टेशन हैं।