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Hamirpur: इंदु बोलीं- अनुसूचित जनजातियों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को इतिहास में नहीं पढ़ाना विडंबना

Sat, 22 Apr 2023 07:02 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर

सार

नई दिल्ली से समाजसेवी प्रकाश चंद शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बीज वक्ता के रूप में प्रो. नारायण सिंह राव, निदेशक सप्त सिंधु देहरा परिसर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय रहे। दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
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ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान नेरी हमीरपुर में राष्ट्रीय परिसंवाद। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान नेरी हमीरपुर में पश्चिमोत्तर भारत की अनुसूचित जनजातियों का समाज, पर्यावास एवं अर्थव्यवस्था’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। इसमें राज्यसभा सांसद इंदु बाला गोस्वामी ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। कार्यक्रम के अध्यक्ष हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल रहे। नई दिल्ली से समाजसेवी प्रकाश चंद शर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बीज वक्ता के रूप में प्रो. नारायण सिंह राव, निदेशक सप्त सिंधु देहरा परिसर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय रहे। दीप प्रज्वलन व सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

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शशि शर्मा ने संकल्प पाठ, जबकि डॉ. कृष्ण मोहन पाण्डेय ने इतिहास पुरुष वाचन किया। मंचासीन अतिथियों व अन्य विद्वानों का परिचय एवं स्वागत डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने करवाया। मुख्यातिथि सांसद इंदु बाला गोस्वामी ने कहा कि अनुसूचित जनजातियों का इतिहास गौरवमयी रहा है। अनुसूचित जनजातियों ने देश की स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई है, परंतु यह विडंबना है कि कभी इतिहास में इसे नहीं पढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि यह हर्ष का विषय है कि शोध संस्थान पश्चिमोत्तर भारत की अनुसूचित जनजातियों का समाज, पर्यावास एवं अर्थव्यवस्था विषय पर आजादी के अमृत काल में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है।

केंद्र व राज्य सरकारें अनुसूचित जनजातियों को मुख्य धारा में लाने में निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इन जातियों ने जल, जंगल, जमीन व पर्यावरण के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाई है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कहा कि ब्रिटिश काल से ही अनुसूचित जनजातियों के साथ सौतेला व्यवहार किया गया व उन्हें मुख्य धारा उसे अलग रखा गया। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज भी इन जातियों के लिए बनाई गई योजनाओं का बहुत कम लाभ पात्रों को प्राप्त होता है। बीज वक्ता प्रो. नारायण सिंह राव ने कहा कि वेद ज्ञान का समृद्ध प्रवाह भारतीय लोक मानस में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। इसे भारतीय जनजातीय क्षेत्र में भी सर्वत्र देखा जा सकता है।
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यूरोपीय विद्वानों व ब्रिटिश प्रशासकों ने वनवासियों को जंगली, क्रूर, असभ्य, बर्बर आदि माना। ब्रिटिश प्रशासकों ने पहाड़ियों और घाटी के निवासियों के बीच और अधिक विभाजन पैदा करने के उद्देश्य से अनियंत्रित क्षेत्रों, बहिष्कृत क्षेत्रों व आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों की अवधारणाओं को भी पेश किया। उनकी कृत्रिम पहचान बनाई। स्वतंत्रता के बाद भी अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण एवं संवर्धन व विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए गए। इस उपलक्ष्य पर राष्ट्रीय परिसंवाद से संबंधित स्मारिका का विमोचन किया गया।

परिसंवाद की भूमिका संयोजक डॉ. अंकुश भारद्वाज ने प्रस्तुत की। धन्यवाद ज्ञापन संस्थान निदेशक सुरेंद्र नाथ शर्मा ने किया। इस उपलक्ष्य पर शोध संस्थान निदेशक डॉ. चेतराम गर्ग, नरेंद्र कुमार नंदा, प्यार चंद परमार, कोषाध्यक्ष देशराज शर्मा, डॉ. बीआर ठाकुर, प्रो. शुभजीत चौधरी, डॉ. कैलाश चंद गुर्जर, डॉ. महेंद्र, प्रो. इंद्रजीत सोढी, डॉ. सुमन नेगी, डॉ. सुमेर खजूरिया, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. विकास, सतीश कुमार, प्रो. राजेश शर्मा, डॉ. राघवेंद्र यादव, डॉ. कंवर चंद्रदीप, डॉ. सूरत ठाकुर सहित 120 विद्वान उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र के बाद तीन तकनीकी सत्रों में 25 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
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