शिमला में कारगिल विजय दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व सैनिकों ने साझा किए अनुभव
कहा-तीन महीने तक कठिन हालात में रहकर दुश्मनों को चटाई धूल
पूर्व सैनिकों ने युवाओं में बढ़ती नशे की लत पर जताई चिंता, बोले-इस लड़ाई में हम कंधे से कंधा मिलाकर करेंगे काम
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। कारगिल युद्ध में भारत की सेना ने अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान की सेना को धूल चटाई थी। ऊंचाई पर होने के कारण पाकिस्तान के सैनिकों को युद्ध में बड़ी मदद मिल रही थी और इसका फायदा उठाकर वे भारत की सेना पर एक के बाद एक जानलेवा हमले कर रहे थे। इसके बावजूद भारतीय सेना के जवानों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए तीन महीने तक चले इस युद्ध में दुश्मन को भागकर खड़े होने पर मजबूर कर दिया। युद्ध में जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए उस समय देशभर से बच्चे और बहनें पोस्टकार्ड भेजकर हौसला बढ़ाती थीं।
शिमला में कारगिल विजय दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में युद्ध का हिस्सा रहे पूर्व सैनिकों ने अपने अनुभव साझा किए। जेएंडके राइफल के नायक सेवानिवृत्त जय सिंह ने बताया कि इस युद्ध में बोफोर्स भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ा सहारा बनी। इसकी मदद से सेना ने पाकिस्तान के सैनिकों को मात देने में कामयाबी हासिल की। उन्होंने बताया कि जब उनकी यूनिट ने जिम्मी टॉप से पाकिस्तानियों को खदेड़ा तो वहां वह गोभी की सब्जी और चावल छोड़कर गए थे। पहले तो खाने में जहर होने का खतरा था लेकिन फिर पहले एक सैनिक ने खाकर देखा कि कहीं यह जहरीला तो नहीं है और फिर सभी सैनिकों ने उस खाने को खाया। जय सिंह ने बताया कि वर्तमान में युवा पीढ़ी नशे की लत का शिकार होती जा रही है जो कि चिंता का विषय है। उन्होंने प्रशासन के सामने प्रस्ताव रखा कि इस लड़ाई में पूर्व सैनिक पुलिस और प्रशासन का साथ देने के लिए तैयार हैं। इसी तरह से सूबेदार वीर प्रकाश शर्मा, सूबेदार मेजर दिवाकर दत्त शर्मा, सूबेदार मेजर वेद प्रकाश शर्मा, सूबेदार मेजर ऑनरेरी कैप्टन शामलाल शर्मा ने भी कारगिल युद्ध के अपने-अपने अनुभवों को साझा किया और अपने बलिदान होने वाले साथियों को याद किया।
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पानी के लिए भर तरस जाते थे, बलिदानियों को किया याद
संजौली के रहने वाले हवलदार प्रवीण शर्मा ने बताया कि उनकी यूनिट को टाइगर हिल को जीतने का मौका मिला था। सबसे आगे रहकर इस लड़ाई को लड़ा। कई साथी इस दौरान दुश्मनों के साथ लड़ते हुए बलिदान हो गए। आज भी उन दिनों को याद करके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी यूनिट द्रास पहुंचने वालों में सबसे पहली थी। यहां पहुंचते ही पाकिस्तानियों ने बमबारी और गोला बारूद से हमला कर दिया। किसी तरह से सैनिकों ने खुद को संभाला। लड़ाई के दौरान कठिन भौगोलिक परिस्थिति थी। कई दिनों तक खाना भी नहीं मिलता था। हालत यह थे कि कई बार तो पानी के लिए भी तरस जाते थे।
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स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाए शहीदों की प्रेरणात्मक कहानियां
सूबेदार सेवानिवृत्त रामलाल शर्मा ने कहा कि धमून से ही चार सैनिकों ने एक साथ युद्ध में भाग लिया। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि कारगिल जैसे शौर्य की गाथाओं को स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाया जाए जिससे देश की युवा पीढ़ी इस बारे में जान सके। इस दौरान युद्ध के अनुभव साझा करते हुए वे भावुक भी हो गए।
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हवलदार सेवानिवृत्त लक्ष्मीदत्त शर्मा ने बताया कि वे 13 जेएंडके राइफल में थे जिसमें परवीर चक्र विजेता विक्रम बतरा भी थे। उन्होंने बताया कि प्वाइंट 4140 और 4875 का टास्क उनकी यूनिट को मिला था। पाकिस्तान के सैनिकों से आमने-सामने की लड़ाई लड़ी। इस दौरान कई साथी बलिदान हो गए लेकिन उनके बलिदान और शौर्य की वजह से हमने अपनी सभी चौकियों को वापस हासिल कर लिया।