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वीडियो: चंबा में टूटी 441 साल पुरानी लोहड़ी की परंपरा

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चंबा में लोहड़ी पर्व पर 441 साल से चली आ रही परंपरा इस बार टूट गई। राजमढ़ी से चलने वाली मशाल इस बार नहीं उठी। पशु बलि न होने पर राजमढ़ी के कारिंदों ने मशाल उठाने से मना कर दिया और मशाल को वहीं पर जल रहे अलाव के हवाले कर दिया। यहां इस पर्व को खूनी लोहड़ी के रूप में मनाया जाता था। रियासतकाल में यहां लोहड़ी पर्व के दौरान मढ़ियों (चबूतरा) को कब्जे में लेने पर यदि मारपीट में किसी की जान जाती थी तो राजा द्वारा एक खून माफ होता था।
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विधि के अनुसार सुराड़ा मोहल्ला से हर वर्ष मशाल पशु बलि देकर उठती थी। इसके बाद मशाल हर मढ़ी में आंशिक रूप से डूबो कर पूरे शहर की परिक्रमा करते हुए वापस राजमढ़ी सुराड़ा में आती थी। लेकिन इस बार हाईकोर्ट के आदेश से पशु बलि नहीं दी गई है। बुद्धिजीवियों ने कहा कि यदि पशु बलि नहीं दी गई तो मशाल कैसे उठेगी। सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि इस बार मशाल शहर की परिक्रमा नहीं करेगी।

ऐसे निभाई गई रस्म

इस प्रथा को कायम रखने के लिए विकल्प के रूप में चौंतड़ा की बजीर मढ़ी ने शहर की मढ़ियों का चक्कर काटते हुए इस पवित्र रस्म को निभाया। इन मढ़ियों से होकर जाती थी मशाल- 1573 में राजा प्रताप सिंह ने सुराड़ा को पुरुष राजमढ़ी का दर्जा दिया था। इसके साथ सपड़ी मढ़ी, नंद मढ़ी, बजीर मढ़ी (चौंतड़ा) जनसाली मढ़ी, चौगान मढ़ी, बनगोटू मढ़ी, ध्रोबी मढ़ी, झीर मढ़ी, चरपट मढ़ी, हटनाला मढ़ी, रामगढ़ मढ़ी, खरूड़ा मढ़ी व नर्सिंग मढ़ी से होकर मशाल जाती थी।

राजमढ़ी से मशाल शुरू होकर सभी मढ़ियों से होते हुए राजमढ़ी आती थी। क्या थी परंपरा- मशाल में पशु बलि देकर खून का पंजा लगाया जाता था। इसके बाद पूजा कर मशाल की शुरुआत की जाती थी और मशाल प्रज्वलित कर शहर की परिक्रमा की जाती थी।
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