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Shimla News: बीमा कंपनी को 75 हजार रुपये अदा करने का आदेश

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जिला आयोग का फैसला पलटा, पीड़ित पक्ष को राहत
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20 हजार प्रताड़ना के और 10 हजार मुकदमा खर्च भी देना होगा
रुचि सांख्यान
शिमला। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने पॉलिसी सरेंडर करने के बाद पूरी राशि न लौटाने पर बजाज आलियांज लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को कड़ी फटकार लगाई है। इसके साथ कंपनी को हर्जाना भी लगाया है।
आयोग ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह उपभोक्ता के आश्रितों को शेष राशि 75,176 रुपये नौ प्रतिशत सालाना ब्याज सहित अदा करे। इसके साथ ही मानसिक प्रताड़ना पर कंपनी को 20 हजार रुपये हर्जाना और 10 हजार रुपये कानूनी खर्च के देने का आदेश दिया है। राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंद्र सिंह मेहता और सदस्य योगिता दत्ता की पीठ ने जिला उपभोक्ता आयोग ऊना के पुराने फैसले को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया है। ऊना निवासी जसवंत राय (अब स्वर्गीय) ने बजाज आलियांज लाइफ इंश्योरेंस कंपनी से सात साल की अवधि के लिए जीवन बीमा पॉलिसी ली थी जिसका प्रीमियम सालाना जमा करना था। उन्होंने लगातार छह वर्षों तक 3,10,176 रुपये का प्रीमियम जमा करवाया था।
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इसके बाद पत्नी की गंभीर बीमारी और आर्थिक तंगी के चलते वह सातवीं किस्त जमा नहीं करवा सके और उन्होंने पॉलिसी सरेंडर कर दी। बीमा कंपनी ने सरेंडर वैल्यू के नाम पर उन्हें महज 2,35,000 रुपये ही लौटाए। शेष राशि के लिए बार-बार चक्कर काटने के बाद भी जब राहत नहीं मिली तो उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी।
जिला उपभोक्ता आयोग ऊना ने 20 नवंबर 2019 को दस्तावेजों के अभाव का हवाला देते हुए जसवंत राय की शिकायत खारिज कर दी थी। जसवंत राय के कानूनी वारिसों पत्नी कृष्णा देवी और चारों बेटों (जगमोहन, मनमोहन, बृजमोहन व गोपाल कृष्ण) ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दाखिल की थी। अपील की सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी द्वारा पेश किए प्रीमियम पेमेंट सर्टिफिकेट से यह साबित हो गया कि उपभोक्ता ने 3,10,176 रुपये का भुगतान किया था।
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पुख्ता दस्तावेज या गणना पेश नहीं कर पाई कंपनी
राज्य आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बीमा कंपनी ऐसा कोई पुख्ता दस्तावेज या गणना प्रस्तुत नहीं कर पाई जिससे यह सिद्ध हो सके कि नियमों के तहत देय सरेंडर वैल्यू मात्र 2,35,000 रुपये ही बनती थी। कंपनी के अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि दोनों पक्षों के बीच लगभग 74,920 रुपये का विवाद बना हुआ था। आयोग ने माना कि उपभोक्ता की शेष राशि को रोकना सेवा में कमी और अनुचित है। बीमा कंपनी को इस आदेश का पालन प्रति मिलने के 45 दिन के भीतर करने का आदेश दिया है।
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