मेरे जन्म के बाद घर में सब खुश थे लेकिन शायद बहुत खुश भी नहीं थे। घर में पहले से पांच लड़कियां थी। जैसे-जैसे बड़ी हुई मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं कहीं माता-पिता पर बोझ न बन जाऊं।
परिवार बड़ा था और कमाने वाले सिर्फ मेरे पिता ही हैं। वे ढाबा चलाते हैं। गरीबी की वजह से कई बार हौसला टूटने लगा लेकिन माता और पिता की प्रेरणा से मंजिल की तरफ कदम बढ़ते रहे।
एक ही परिवार में छह बहनें होने पर गांव के लोग तरह-तरह की बातें करते थे, लेकिन मेरे माता-पिता ने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यही सोचकर दिल में कुछ करने की ठानी और मंजिल तय की।