सर्दी हो या गर्मी, जंगल के रास्ते से रोजाना 20 किलोमीटर का पैदल सफर कर जंगली जानवरों के खौफ के बीच स्कूल जाते थे। रात को भी स्कूल से कभी नौ तो कभी दस बजे घर पहुंचते थे। हमेशा यही डर सताता था कि घर पहुंचेंगे भी या नहीं।
हमारे इलाके में भालुओं का खौफ रहता है। सर्दियों के दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। समाज के कुछ लोग कहते थे कि बेटी की किस्मत में घर संभालना ही लिखा है, लेकिन मेरे पिता रामलाल और माता प्रभा देवी ने इन सब बातों पर ध्यान न देकर आर्थिक तंगी के बावजूद मुझे पढ़ाया।
मैंने भी ठान लिया कि पढ़ लिखकर मैं पापा का सपना पूरा करुंगी। यह कहना है आनी के शुश निवासी सपना वर्मा का। पिताजी चंडीगढ़ में प्राइवेट नौकरी करते हैं।