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बेटियों के लिए मिसाल है सपना की कहानी, पढ़ें जरूर

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सर्दी हो या गर्मी, जंगल के रास्ते से रोजाना 20 किलोमीटर का पैदल सफर कर जंगली जानवरों के खौफ के बीच स्कूल जाते थे। रात को भी स्कूल से कभी नौ तो कभी दस बजे घर पहुंचते थे। हमेशा यही डर सताता था कि घर पहुंचेंगे भी या नहीं।
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हमारे इलाके में भालुओं का खौफ रहता है। सर्दियों के दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। समाज के कुछ लोग कहते थे कि बेटी की किस्मत में घर संभालना ही लिखा है, लेकिन मेरे पिता रामलाल और माता प्रभा देवी ने इन सब बातों पर ध्यान न देकर आर्थिक तंगी के बावजूद मुझे पढ़ाया।

मैंने भी ठान लिया कि पढ़ लिखकर मैं पापा का सपना पूरा करुंगी। यह कहना है आनी के शुश निवासी सपना वर्मा का। पिताजी चंडीगढ़ में प्राइवेट नौकरी करते हैं।
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पिता ने दिया मेरा साथ

कहती हैं कि हमारे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। जमा एक कक्षा में साइंस विषय पढ़ना चाहती थी, लेकिन पिताजी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे महंगी किताबें खरीदकर लाएं। इस वजह से मुझे सीनियर सेकेंडरी स्कूल दलाश में आर्ट्स में दाखिला लेना पड़ा। मेरे माता-पिता ने कभी बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं समझा। हमें पढ़ाने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया।

मेरी दसवीं तक की पढ़ाई शुश स्कूल से हुई। रोजाना स्कूल पैदल जाना पड़ता था। कभी-कभी तो रात को 9-10 बजे घर पहुंचते थे। इन कठोर परिस्थितियों के बावजूद कभी हिम्मत नहीं हारी। दलाश स्कूल से जमा दो की। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते मेरी आगे की पढ़ाई को लेकर माता-पिता के बीच विवाद हुआ। इसके बाद पिता ने मुझे पढ़ाने का निर्णय लिया।

इसके बाद वर्ष 2014 में मैंने आनी कॉलेज में एडमिशन ली। वहीं से आगे की पढ़ाई कर रही हूं। आज बेटे और बेटी में फर्क समझने वाले उस समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। मुझे खुशी है कि मैंने ऐसे परिवार में जन्म लिया, जहां माता-पिता ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। मुझे पढ़ने का शौक है। मैंने स्कूल और कॉलेज स्तर पर कई भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पहला स्थान हासिल किया है। ये कहानी है कुल्‍लू के आनी के तहत आने वाले शुश की सपना वर्मा की।
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