तलहटी में बढ़े सल्फेट
अध्ययन में ऊंचाई के आधार पर एरोसोल में अलग-अलग बदलाव सामने आए। जहां 4,000 मीटर से ऊपर सल्फेट एरोसोल में कमी दर्ज हुई, वहीं हिमालय की तलहटी में इनमें 0.0011 प्रति वर्ष की वृद्धि का रुझान मिला। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार तलहटी में सल्फर डाइऑक्साइड के स्रोत और वातावरण में नमी अधिक होने के कारण सल्फेट कणों के बनने और टिके रहने की संभावना अधिक है।
ब्लैक कार्बन और धूल भी बढ़ी
उत्तर-पश्चिमी हिमालय में ब्लैक कार्बन और धूल के एरोसोल में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये कण सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित कर गर्मी बढ़ा सकते हैं। बर्फ पर जमा ब्लैक कार्बन उसकी सूर्य की किरणों को परावर्तित करने की क्षमता घटाता है, जिससे बर्फ पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अध्ययनकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि हिमालय में बढ़ती गर्मी के लिए केवल सल्फेट एरोसोल की कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अध्ययन के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव तापमान बढ़ने का प्रमुख कारण है। इसके अलावा ब्लैक कार्बन, धूल, बर्फ की परावर्तन क्षमता में बदलाव और बड़े पैमाने पर वायुमंडलीय परिसंचरण भी योगदान देते हैं।
इन्होंने किया शोध
आईआईटी मंडी के शोधार्थियों गौरव और सरिता आजाद ने यह अध्ययन किया है। इन्होंने 1980 से 2023 तक के आंकड़ों में सल्फेट एरोसोल, ब्लैक कार्बन, धूल और तापमान में दीर्घकालिक बदलावों का विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य सल्फेट एरोसोल में बदलाव और हिमालय में बढ़ते तापमान के संबंध को समझना था।
इन निष्कर्षों से ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु और वायु प्रदूषण पर करीबी नजर रखने की आवश्यकता और मजबूत होती है। तापमान और वायुमंडल में एरोसोल में बदलाव बर्फ और ग्लेशियरों, जल सुरक्षा तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। - पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं विशेष सचिव, आपदा