हालांकि पोटेशियम का स्तर कम पाया गया। जिला किन्नौर के पूह और निचार ब्लॉकों में किए सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण से पता चला कि प्राकृतिक खेती के तहत जिंक, कॉपर, आयरन और मैंगनीज का स्तर पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक था। निचार में परंपरागत के बजाय प्राकृतिक बागवानी वाले बगीचों में मिट्टी में इन पोषक तत्वों का स्तर अत्यधिक उच्च पाया गया। इससे मालूम हुआ कि प्राकृतिक खेती मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने और पौधों के लिए जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अधिक प्रभावी रही है, जिससे फसल का बेहतर विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और उच्च पैदावार पाई गई। प्राकृतिक खेती से कुल परिवर्तनीय लागतों में 46.76 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी आई। यह किसानों के लिए एक बड़ा आर्थिक लाभ है क्योंकि इससे उनकी शुद्ध आय में वृद्धि पाई गई। हालांकि, प्राकृतिक खेती में उपज में 1.59 प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई जो प्रति हेक्टेयर 161.25 क्विंटल रही। यह दर्शाता है कि लागत कम होने के बावजूद उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। अध्ययन में पाया गया कि प्राकृतिक खेती में वूली एफिड और लीफ फोल्डर जैसे कीट पारंपरिक खेती की तुलना में काफी अधिक पाए गए। उदाहरण के लिए जिला शिमला के चौपाल में वूली एफिड 30.43 प्रतिशत बनाम 20.92 प्रतिशत रहा।
रसायनों का उपयोग न होने से पर्यावरण को लाभ
पूह में लीफ फोल्डर 41 प्रतिशत बनाम 5.5 प्रतिशत था। सैनजोस स्केल और एप्पल रूट बोरर में भी कुछ ब्लॉकों में प्राकृतिक खेती में अधिक प्रकोप देखा गया। हालांकि, प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग न होने से पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होता है और यह पारिस्थितिकी संतुलन को भी बढ़ावा देता है जो लंबी अवधि में कीटों के प्राकृतिक नियंत्रण में मदद कर सकता है। इन कीटों व बीमारियों को आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र जैसे वानस्पतिक जैव-कीटनाशकों से नियंत्रित किया जा सकता है। कैंकर, रूट रॉट और कॉलर रॉट आदि की प्राकृतिक खेती में कमी देखी गई। उदाहरण के लिए चौपाल में कॉलर रॉट प्राकृतिक बागवानी में 0.38 और परंपरागत बागवानी में 1.87 प्रतिशत रहा।