यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी ए (2025) में प्रकाशित हुआ। आईआईटी मंडी की यह खोज बताती है कि झुंड और समूह में होने वाला तालमेल सिर्फ नियमों पर नहीं, बल्कि परसेप्शन यानी देखने-समझने की प्रक्रिया पर भी निर्भर करता है। यह न सिर्फ प्रकृति को समझने में मदद करेगा, बल्कि रोबोटिक्स, न्यूरोसाइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में नई राहें खोलेगा। आईआईटी मंडी की टीम ने बताया कि जब कोई पक्षी या मछली अपने आसपास के दूसरे साथी को देखते हैं तो वह तुरंत एक पक्का फैसला नहीं लेते, बल्कि दिमाग में कई संभावनाएं एक साथ रहती हैं। जैसे क्वांटम फिजिक्स में कोई कण कई अवस्थाओं में तब तक रहता है जब तक उसे देखा न जाए। यही तरीका समझाता है कि बिना किसी लीडर के भी पूरा झुंड एक जैसा तालमेल कैसे बना लेता है।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दो नए पैमाने भी पेश किए हैं। इसमें परसेप्शन स्ट्रेंथ एवं परसेप्चुअल एनर्जी शामिल है। परसेप्शन स्ट्रेंथ यह मापता है कि एक एजेंट अपने साथी की ओर कितना ध्यान देता है और उसके हिसाब से खुद को कितनी जल्दी बदलता है। वहीं, पर्सेप्चुअल एनर्जी यह बताती है कि पूरा समूह कितनी स्थिरता और मजबूती से साथ बना रह सकता है। अध्ययन बताता है कि तालमेल और टीमवर्क केवल नियमों से नहीं, बल्कि देखने और समझने की क्षमता से पैदा होता है। यही वजह है कि झुंड या समूह, मुश्किल हालात में भी साथ बने रहते हैं और संगठित दिखते हैं। उधर, आईआईटी मंडी के निदेशक प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा ने कहा कि हमारा काम दिखाता है कि क्वांटम से जुड़े विचार सिर्फ भौतिकी तक सीमित नहीं हैं।
इसीलिए है यह खोज खास
प्रकृति यह बताती है कि झुंड शोर या रुकावटों के बावजूद साथ क्यों रहते हैं। रोबोटिक्स में खोज और बचाव (जैसे भूकंप के बाद) या स्पेस मिशन में ड्रोन-स्वार्म्स ज्यादा स्मार्ट और लचीले बन सकते हैं। न्यूरोसाइंस में यह समझने में मदद करेगा कि इंसानों की सोच कभी-कभी अचानक क्यों बदल जाती है। एआई में भविष्य के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम अधूरी या उलझी हुई जानकारी को ज्यादा अच्छे से समझ पाएंगे।