विश्व की सर्वाधिक पुरातन रचना वेदों के ज्ञान पर विज्ञान निरंतर मुहर लगा रहा है। हम वेदों की मौलिकता पर मनन करने की बजाय इसमें दर्ज ज्ञान को वैज्ञानिकों की पुष्टि के बाद ही स्वीकार कर रहे हैं। संस्कृत के अनेक विद्वानों ने यह बात संस्कृत अकादमी के राज्य स्तरीय वैदिक सम्मेलन में स्वीकार की।
चिंता भी प्रकट की गई कि संस्कृत भाषा में वेदों की स्वरूप रचना हुई, उसे सदियों से बिसराने का षड्यंत्र चल रहा है। इस पर सचेत होने की जरूरत है। गेयटी थियेटर में वैदिक सम्मेलन दो सत्रों में हुआ। सुबह के सत्र में मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. एडीएन बाजपेयी थे। डा. शशिभूषण चीफ गेस्ट रहे।
पंचमुखी हनुमान केलटी के अर्चक पंडित संजय शास्त्री और संस्कृत महाविद्यालय सोलन के विद्यार्थियों के मंत्रोच्चारण के बीच उन्होंने दीप प्रज्वलन किया। प्रदेश संस्कृत अकादमी के सचिव डा. मस्तराम शर्मा ने उनका स्वागत किया। मंच संचालन डा. मनोहर लाल ने किया।
प्रो. एडीएन बाजपेयी ने कहा कि संस्कृत देववाणी और वेदवाणी से भी बढ़कर देहवाणी हैं। उन्होंने कहा कि एक षड्यंत्र के तहत संस्कृत को बहुत ही दुर्बोध भाषा बोल दिया गया, जबकि यह अत्यंत सरल है। उन्होंने सुरेश शर्मा भारद्वाज की पुस्तक देवीचरितम् का भी विमोचन कि। शाम के सत्र की अध्यक्षता पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने की। परिचर्चा सत्र में डा. गोकुल चंद शर्मा बतौर अध्यक्ष शामिल हुए।
इन विद्वानों ने पढ़े पत्र
डा. बृहस्पति मिश्र, डा. गिरिराज शर्मा, डा. ओमदत्त सरोच, डा. मुकेश शर्मा, डा. रमेश शर्मा, प्रो. एमसी सक्सेना और डा. राकेश कुमार शर्मा ने वैदिक ज्ञान पर अपने पत्र पढ़े।