हिमाचल सरकार ने बलि पर रोक पर हाईकोर्ट में जवाब दिया कि राज्य की तरफ से जानवरों के अधिकारों की सुरक्षा कानून के अनुरूप की जा रही है। सरकार ने कहा कि भैंसें, बकरे-बकरियां और भेड़ें न तो मारने के लिए पीटी जाती हैं और न ही ढांक से खींचकर गिराई जाती हैं।
मंदिरों में पशुओं का वध झटका विधि से मंदिरों में किया जाता है। अपने जवाब में सरकार ने सिविल रिट पीटिशन को खारिज करने की प्रार्थना की।
हाईकोर्ट में यह जवाब मुख्य सचिव, प्रधान सचिव गृह, प्रधान सचिव ग्रामीण विकास, पशुपालन सचिव और भाषा एवं संस्कृति सचिव की तरफ से दिया गया।
रिपोर्ट को बनाया आधार
सरकार ने जवाब दिया कि जिलों के पुलिस अधीक्षकों से जानकारी मिली है कि धार्मिक रिवाजों के रूप में जिला बिलासपुर, बद्दी, चंबा, हमीरपुर, किन्नौर, कांगड़ा, लाहौल स्पीति, सोलन, सिरमौर और ऊना में क्रूरता से जानवरों को मारने की कोई घटना नहीं हुई है।
कुल्लू जिले के निरमंड और आनी क्षेत्रों में जानवरों की कुछ बलियां दी जाती हैं पर यह रिवाज अब काफी घट गया है। यद्यपि जिला पुलिस कुल्लू ने जानवरों की निर्मम हत्या की कोई शिकायत को रिसीव नहीं किया है।
पुलिस अधीक्षक मंडी ने सूचित किया है कि अष्टमी एवं अन्य धार्मिक आयोजनों के अवसरों पर कामरू नाग, कामाक्षा माता और अन्य मंदिरों में बलियां दी जाती हैं। कामाक्षा माता मंदिर में तो दो साल से भैंसों की बलि भी बंद है।
पशु बलि में आई है कमी
शिमला पुलिस अधीक्षक ने बताया है कि रामपुर, रोहडू़, कोटखाई, झाकड़ी और चिड़गांव पुलिस स्टेशनों के तहत आने वाले कई क्षेत्रों में स्थानीय गांवों के लोग देवताओं को बकरों और भेड़ों की बलियां देते हैं।
इस तरह से यह गलत और इंकार करने योग्य है कि देवताओं से जुड़े लोगों द्वारा हजारों की संख्या में जानवरों की हिमाचल में निर्ममता से हत्या की जा रही है। पुलिस अधीक्षक कांगड़ा की रिपोर्ट के मुताबिक अब चामुंडा माता मंदिर में पशुओं की बलि नहीं दी जाती।