शिमला में हाल के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया कि संवेदनशीलता तो दूर इसके उलट हम कितने निर्दयी होते जा रहे हैं और इसका हमें पता भी नहीं चलता। शिमला के कमला नेहरू अस्पताल यानी केएनएच में बच्चा बदलने की घटना ले लीजिए।
केएनएच हिमाचल में जच्चा-बच्चा का अकेला अस्पताल है और दूर-दूर से बड़ी उम्मीद लेकर गर्भवती महिलाएं यहां पूरे भरोसे और एतमाद के साथ डिलिवरी के लिए आती हैं। ऐसी ही एक मां यहां बीते 26 मई को आई थी। वह खुद आईजीएमसी में स्टाफ नर्स है। तो आप समझ सकते हैं वह कितने भरोसे के साथ यहां आई होगी। रात 11.10 बजे प्रसव के तुरंत बाद बताया गया कि उसे बेटा हुआ है।
उसकी एक तीन साल की बेटी भी थी। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि एक बेटा देकर उसने उसका परिवार पूरा कर दिया। लेकिन बेड पर आई तो उसकी गोद में बेटी थमा दी गई। उसके लिए चौंकना स्वाभाविक था। लेकिन उसने या उसके शिक्षक पति ने हल्ला नहीं मचाया जो ऐसे मौकों पर बड़ी आम सी बात है। शिक्षक पति ने बड़ी विनम्रता से अस्पताल प्रशासन से कहा कि कहीं कोई चूक हो रही है।
जन्म के वक्त उन्हें लड़का बताया गया था। कहीं ऐसा न हो कि बच्चा बदल गया हो। उस पर एक अस्पताल कर्मी ने उसे डांटा और कहा तुम क्या समझते हो यहां बच्चे बदले जाते हैं? अगली सुबह वह मां डिस्चार्ज कर दी गई क्योंकि अस्पताल में उसके लिए बेड नहीं था। भारी मन से मंडी का रहने वाला यह दंपति वहां से चला गया।
डीएनए टेस्ट में सामने आई सच्चाई, अब कैसे होगी बेटे की वापसी
लेकिन शंका का बीज मन में बैठ चुका था। पति ने मां और उस बेटी का डीएनए टेस्ट कराया। इसमें पेरेंटटी शून्य निकली यानी वह मासूम बच्ची इस मां की नहीं थी। डीएनए जांच की रिपोर्ट लेकर वह पति फिर केएनएच जाता है। वहां उसे समझाया जाता है कई बार बच्चे की डीएनए मां से मैच नहीं करता। आप अपने से मैच कराइए। अस्पताल की वह वरिष्ठ नर्स उन्हें बताती है कि उसका डीएनए खुद उसके अपने बेटे से मैच नहीं करता है।
जबकि विज्ञान कहता है कि हर बच्चे का डीएनए उसके जैविक मां-बाप से जरूर मैच करता है। यह अटल सत्य है। लेकिन संवेदनहीन हेड नर्स मामले की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए उस पिता को वहां से भगा देती है। दंपति शिमला के एसपी से गुहार करते हैं। छोटा शिमला थाने में एफआईआर दर्ज होती है। उस बच्ची के जन्म से ठीक तीन मिनट पहले एक और महिला की डिलिवरी हुई थी। वह बेटा था।
मंडी के इस दंपति को लगता है कि उनका बच्चा इसी से बदला है। लेकिन शिमला में रहने वाला दूसरा दंपति इससे साफ इंकार कर देता है। पुलिस उनसे डीएनए मैच कराने को कहती है लेकिन वह दंपति इंकार कर देता है। वे कहते हैं - हम सैंपल नहीं देंगे। पुलिस खामोश बैठ जाती है। अंत में मंडी का दंपति हाईकोर्ट और मीडिया की शरण में जाता है। कोर्ट पूरे मामले की जांच के आदेश देता है।
अब उस दिन जन्मे सभी बच्चों का डीएनए मंडी के इस दंपति से मैच कराया जाएगा। मैंने उस शिक्षक पिता से पूछा कि आपका बेटा मिल जाएगा तो इस बेटी का क्या होगा? उस पिता ने कहा - इसके घर वाले अगर इसे स्वीकार न करें तो मैं इस प्यारी बच्ची को भी पाल लूंगा। लेकिन मुझे अपना बेटा भी चाहिए।
पांच महीने से भटक रहा है दंपति
कहते हैं ईश्वर के घर में देर है अंधेर नहीं। मंडी के इस दंपति को एक दिन उनका बच्चा जरूर मिल जाएगा। लेकिन जरा सोचिए हमारा समाज किस राह पर जा रहा है। एक दंपति को अपना ही बच्चा पाने के लिए पांच महीने से संघर्ष करना पड़ रहा है जिसे वे आज तक देख भी नहीं पाए। एक मां जो खुद स्टाफ नर्स है, अपना बच्चा बदलने से नहीं रोक पाती।
वह मामले को बिना हल्ला मचाए सुलझाना चाहती थी क्योंकि वह खुद इस पेशे से जुड़ी थी। पर खुद अस्पताल प्रशासन उसका साथ नहीं देता जबकि उसके पास अकाट्य प्रमाण है कि केएनएच में उसका बच्चा बदला है। सारे प्रमाण होने के बावजूद पुलिस उस दंपति को इंसाफ नहीं दिला पाती और उन्हें कोर्ट की शरण में जाना पड़ता है। फिर आप कहते हैं कोर्ट में मुकदमे बढ़ गए हैं। हर काम कोर्ट करेगी तो इस सरकारी सिस्टम की क्या जरूरत है, जिन पर हर साल जनता का हजारों करोड़ रुपया खर्च होता है।
एक और घटना पर गौर फरमाइए शिमला के खलीनी में रात दस बजे एक शराबी सड़क पर लड़खड़ा कर बार-बार गिर रहा है। युवा उसे सड़क से हटाने के बजाय मोबाइल से उसका वीडियो बनाने लगते हैं। सड़क किनारे बैठा वह शराबी उठने की कोशिश करता है और फिर सड़क की तरफ गिर जाता है। पीछे से आ रहा एक ट्रक उसके सिर को कुचलते हुए आगे बढ़ जाता है।
वीडियो में उसका सिर तरबूज की तरह फटता दिख रहा है। फिर ये वीडियो वायरल हो जाता है। (ये क्लिप आप हमारी वेबसाइट amarujala.com पर देख सकते हैं) क्या वीडियो क्लिप बनाने वाले और उसे ऐसा करते देख रहे लोगों को उस शराबी को बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। कोई इतना कठोर कैसे हो सकता है। क्या हमारे समाज की सोच इतनी बर्बर हो गई है कि हम मौत का लाइव वीडियो बना रहे हैं और मजा ले रहे हैं। कहीं कुछ गलत जरूर है।
ये घटना भी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी
तीसरी घटना का खुद चश्मदीद गवाह हूं। एक महिला के हाथ देने पर सिटी बस अचानक बीच सड़क पर रुक जाती है। पीछे एक कार बस से टकराते-टकराते बचती है। कार से उतर कर वह संभ्रांत व्यक्ति बस के ड्राइवर से आकर कहता है - ये क्या तरीका है गाड़ी चलाने का? बहस शुरू हो जाती है। कंडक्टर उनसे गाली गलौज करने लगता है। व्यक्ति बताता है कि वह कॉलेज में प्रोफेसर है।
बस में बैठी सवारी भी ड्राइवर का पक्ष लेकर बोलती है - प्रोफेसर हैं और सड़क पर ऐसे झगड़ा करते हैं। जाइए, अपना काम कीजिए। बाकी सवारी ड्राइवर की तरफ से उनसे झगड़ने लगती हैं। प्रोफेसर कहते हैं - आप लोग गलत बात का साथ दे रहे हैं। सड़क पर अचानक गाड़ी रोक देना गलत है। मैं पुलिस को बुलाता हूं। कंडक्टर ने कहा - पुलिस को क्या बुलाएंगे। पुलिस भी इसी बस में है। और सवारियों के बीच बैठा पुलिस वाला भी उन प्रोफेसर से गाली गलौज शुरू कर देता है। खुद को अकेला पाकर वह प्रोफेसर मायूस होकर अपनी कार में वापस चला जाता है। सही बात पर साथ देने के लिए उन्हें एक साथी नहीं मिलता।
तो देखिए हम कहां जा रहे हैं। पहाड़ों के बारे में कहा जाता है - यहां के लोग सीधे और सज्जन होते हैं। हमारे पहाड़ों को ये क्या होता जा रहा है। हम इन पत्थरों की तरह निस्पृह और कठोर नहीं हो सकते। सिस्टम में रहने वाले लोग भी कहीं बाहर से नहीं आए। वे भी इस समाज का हिस्सा हैं। तो क्यों हमें एक दूसरे के दुख तकलीफों के प्रति संवेदनशील नहीं होना चाहिए। कल बेटे के लिए भटकते इस निरीह पिता या सड़क पर डोलते उस आदमी या भीड़ में अकेले फंसे प्रोफेसर की जगह आप भी हो सकते हैं। क्या आप अपने साथ इस बर्ताव की कल्पना भी कर सकते हैं। यह सवाल आप एक बार खुद से पूछिएगा।