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श्रावण नवरात्र मेले, सज गए मां के दरबार

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प्रदेशभर के शक्तिपीठों में 27 जुलाई रविवार से श्रावण अष्टमी मेलों की शुरुआत हो रही है। इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु इन शक्तिपीठों पर नतमस्तक होंगे। उधर, कांगड़ा बज्रेश्वरी माता के दर्शन प्रशासन की ओर से ऑनलाइन करवाने की भी व्यवस्था की है।
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नयनादेवी मंदिर का निर्माण पांडवों ने द्वापर युग में किया था। उसी आधार पर वर्तमान स्वरूप का निर्माण बिलासपुर के नरेश महाराजा वीरचंद ने 1400 वर्ष पूर्व करवाया गया।

मान्यता है कि जिस समय महिषासुर राक्षस और नयनादेवी के बीच युद्ध हुआ तो नयनादेवी ने उसे वरदान दिया कि मेरे हाथों मृत्यु होने के कारण तू एक क्षण के लिए भी मेरे चरणों से पृथक नहीं होगा। जहां मेरा पूजन होगा, वहां पर तुम भी पूजे जाओगे।
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तब से यहां माता जगदंबा भी विरामजान है। नयनादेवी मंदिर में आज भी एक ऐसा हवनकुंड है, जिससे हवन एवं यज्ञ से उत्पन्न होने वाली विभूति को बाहर नहीं निकालते। यहां देवी के नयन गिरे थे।

ज्वालामुखी : ज्योतियों के रूप में विराजमान हैं मां ज्वाला

शक्तिपीठ ज्वालामुखी की मान्यता 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि मानी गई है। इन पीठों में यही एक ऐसा शक्तिपीठ है, जहां मां के दर्शन साक्षात ज्योतियों के रूप में होते हैं। शिव महापुराण में भी इस शक्तिपीठ का वर्णन आता है।

जब भगवान शिव माता सती को लेकर पूरे ब्रह्मंड में घूमने लगे तब सती की जिह्वा इस स्थान पर गिरी थी जिससे यहां ज्वाला ज्योति रूप में यहां दर्शन देती हैं। दंत कथा के अनुसार जब माता ज्वाला प्रकट हुईं, तब एक ग्वाले को सबसे पहले पहाड़ी पर ज्योति के दिव्य दर्शन हुए।

राजा भूमिचंद्र ने मंदिर के भवन को बनवाया। धारणा है कि पांडव ज्वालामुखी में आए थे तो कांगड़ा का एक प्रचलित भजन पंजा पंजा पांडवां मैया तेरा भवन बनाया...भी इस का गवाह बना था।

राजा अकबर भी मां ज्वाला की परीक्षा लेने के लिए मां के दरबार में पहुंचा था। उसने ज्योतियों को बुझाने के लिए अकबर नहर का निर्माण करवाया लेकिन मां के चमत्कार से ज्योतियां नहीं बुझ पाईं।

बज्रेश्वरी : वट वृक्ष से डोरी बांधने पर होती है मुराद पूरी

बज्रेश्वरी मंदिर वास्तुकला (शिवालय शैली) के ठेठ उत्तर भारतीय नगाड़ा शैली में निर्मित है। यहां माता का वक्ष गिरा था। अकूत खजाना होने पर महमूद गजनी ने सबसे पहले मंदिर को 1009 में लूटा था।

मंदिर को नष्ट कर उसने यहां मस्जिद बना दी थी। फिर इसे 35 साल बाद स्थानीय राजा ने कब्जे में ले लिया। इसके बाद 1360 में फिरोज शाह तुगलक ने इसे फिर तोड़ दिया। फिर सम्राट अकबर ने इसकी भव्यता बहाल की।

1905 में भूकंप में मंदिर फिर नष्ट हो गया। इसे फिर 1920 में नए सिरे से बनाया गया। दंत कथा के अनुसार मंदिर में वट वृक्ष में अगर कोई श्रद्धालु डोरी बांधे तो मन की हर मुराद पूरी होती है।

मां चामुडा : यहां शतचंडी का पाठ सुनना श्रेष्ठकर है

51 शक्तिपीठों में बनेर नदी के तट पर बना चामुंडा देवी मंदिर महाकाली को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शंकर माता सती को अपने कंधों पर उठाकर घूम रहे थे, तब इसी स्थान पर माता का चरण गिर पड़ा था।

माता यहां शक्तिपीठ रूप में स्थापित हो गई। दुर्गा सप्तशती के सप्तम अध्याय में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार चंड-मुंड नामक दो महादैव देवी से युद्ध करने आए तो देवी ने काली का रूप धारण कर उनका वध कर दिया।

माता देवी की भृकुटी से उत्पन्न कलिका देवी ने जब चंड-मुंड के सिर देवी को उपहार स्वरूप भेंट किए तो देवी भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया कि तुमने चंड-मुंड का बध किया है।

इसलिए आज तुम संसार में चामुंडा के नाम से विख्यात हो जाओगी। मान्यता है कि यहां पर शतचंडी का पाठ सुनना और सुनाना श्रेष्ठकर है।
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माईदास ने की थी छिन्नमस्तिका धाम की खोज

चिंतपूर्णी यानी चिंता हरने वाली महामाई। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है छिन्नमस्तिका मां चिंतपूर्णी का धाम। पौराणिक कथा के अनुसार 14वीं शताब्दी में माई दास नामक मां दुर्गा के परम भक्त ने इस स्थान की खोज की थी। माई दास का जन्म अठूर गांव रियासत पटियाला में हुआ था।

इनके दो बड़े भाई दुर्गादास एवं देवीदास थे। माईदास का सारा समय मां दुर्गा की ही भक्ति में बीतता था। जिसके चलते माईदास परिवार के दूसरे सदस्यों से कटे रहते थे। एक बार जब माईदास ससुराल जा रहे थे तो रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए।

यह वहीं वृक्ष है, जहां अब मां भगवती का भव्य मंदिर है। माईदास को वट वृक्ष के नीचे आराम करते स्वप्न में दिव्य तेजस्वी कन्या के दर्शन हुए। कन्या ने माईदास से कहा कि इसी वृक्ष के नीचे मेरी पिंडी विराजमान है। यहीं रहकर तुम उस की पूजा किया करो। ससुराल से लौटने पर माईदास वट वृक्ष के नीचे ही तपस्या करने बैठ गए।

तपस्या के समय माईदास को मां भगवती ने साक्षात दर्शन देकर कहा कि मैं वट वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं। तुम मेरे परम भक्त हो, इसलिए यहां रहकर मेरी आराधना करो। तब से लकर आज तक माईदास के वंशज ही मां की पूजा-अर्चना के काम को पूरा कर रहे हैं।
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