किताब में 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक से लेकर दीये की लौ से कैसे प्रदेश भाजपा को बुलंदियों पर लाने, बाबरी विध्वंस पर 6 दिसंबर, 1992 को उनकी सरकार गिरने के बाद 1997 में प्रदेश भाजपा के शीर्ष से कैसे हाशिए पर धकेला गया, इसका भी वर्णन है।
2007 में मंडी के पड्डल मैदान में जनता की पुरजोर मांग पर मुख्यमंत्री का दावेदार होने के बावजूद पार्टी की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री घोषित न करने का भी जिक्र है। आपातकाल में 19 माह तक नाहन जेल और हिमाचल भाजपा में सर्वेसर्वा होने के बाद परिवार को दूर रखना, 1989 में सुलह व पालमपुर विस से चुनाव के साथ लोकसभा का चुनाव जीतने का भी उल्लेख किया गया है।
किताब लिखने में लगा एक साल
वरिष्ठ नेता शांता कुमार की लिखी पुस्तक के कवर पेज पर शांता के साथ उनकी पत्नी का फोटो है। पत्नी संतोष शैलजा का उनके सियासी जीवन में सहयोग का खासा जिक्र है। शांता कुमार को इस पुस्तक को लिखने के लिए करीब एक साल का वक्त लगा है।