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Shimla News: शहर में जमीन के नीचे घुलने लगी गंदगी, 93 फीसदी स्त्रोत दूषित

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अमर उजाला एक्सक्लूसिव
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जांच रिपोर्ट में खुलासा, राजधानी में 42 बावड़ियों में से 39 के सैंपल फेल, ज्यादातर हैंडपंप का पानी भी पीने लायक नहीं

भूमिगत जल में पहुंच गया बीमारियां फैलाने वाला बैक्टीरिया
सेप्टिक टैंक और किचन वेस्ट से लगातार बढ़ रही है गंदगी
अशोक चौहान
शिमला। हरे-भरे देवदार और बान के जंगल से घिरी हिल्स क्वीन शिमला में अब बढ़ती आबादी और प्रदूषण का असर दिखने लगा है। शहर से निकल रही गंदगी यहां जमीन के नीचे बह रहे पानी में भी घुल गई है। हालत यह है कि शिमला शहर के ज्यादातर भूमिगत पेयजल स्रोत दूषित हो गए हैं।

शहर में अब ज्यादातर बावड़ियों और हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं है। इसके पानी में ऐसे बैक्टीरिया घुल रहे हैं जिनसे डायरिया, हेपेटाइटिस ए और ई जैसी बीमारियां फैल सकती हैं। राजधानी में पेयजल व्यवस्था का जिम्मा संभाल रही कंपनी और आईजीएमसी की जांच रिपोर्ट के अनुसार शहर की करीब 93 फीसदी बावड़ियों के सैंपल फेल हो गए हैं। जांच रिपोर्ट के अनुसार इनका पानी मानव इस्तेमाल के योग्य नहीं है। शिमला शहर में 42 बावड़ियां चिह्नित हैं। ज्यादातर बावड़ियां चौड़ा मैदान जोन विकासनगर, न्यू शिमला समेत आसपास के उपनगरों में हैं। इनमें से 39 बावड़ियों के सैंपल जांच में फेल निकले हैं।
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कुछ समय पहले आईजीएमसी के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की ओर से करवाए अध्ययन में भी इनके सैंपल फेल पाए गए थे। इसके बाद से पेयजल कंपनी भी अब हर साल इनके पानी की जांच करती है। साल में एक बार इनके सैंपल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लैब में जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। इस साल की जांच रिपोर्ट में भी ज्यादातर बावड़ियों के पानी के सैंपल फेल हो गए हैं। सिर्फ मशोबरा क्षेत्र की कुछ बावड़ियों का पानी पीने लायक मिला है। लोगों को अलर्ट करने के लिए उन सभी बावड़ियों में एडवाइजरी लिखी जा रही है जिनके सैंपल फेल हुए हैं। इनका पानी पीने के लिए इस्तेमाल न करने की सलाह दी गई है। कंपनी ने इन बावड़ियों को सहेजने के लिए भी प्रयास शुरू कर दिए हैं। शहर में 15 से ज्यादा हैंडपंप का पानी भी अभी इस्तेमाल हो रहा है। जांच रिपोर्ट में 10 से ज्यादा हैंडपंप का पानी पीने लायक नहीं पाया गया है।




जमीन के नीचे ऐसे पहुंच रही गंदगी
शहर में दशकों से हजारों लोग इन बावड़ियों का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं। पानी के दूषित होने के बाद पीने के लिए इसका इस्तेमाल कम हुआ है लेकिन जलसंकट के दिनों में अभी भी हजारों लोग इन्हीं बावड़ियों से ही पानी भर रहे हैं। शहर में सीवरेज लाइनों का नेटवर्क तो मजबूत हो रहा है लेकिन इसके बावजूद सैकड़ों घर इनसे नहीं जुड़े हैं। इनमें सेप्टिक टैंक ही बने हैं। इन टैंकों की गंदगी रिसकर भूमिगत जल में घुल रही है जो इसे दूषित कर रही है। शहर के कोर एरिया में हजारों घरों का किचन वेस्ट भी खुले नालों में जा रहा है। बढ़ती आबादी के कारण शहर की पहाड़ियों-नालों में गंदगी बढ़ने से भूमिगत जल पर भी असर पड़ा है।



क्लोरीनेशन-यूवी ट्रीटमेंट से योजनाओं का पानी शुद्ध
कंपनी के अनुसार शिमला शहर को सात योजनाओं गिरि, गुम्मा, कोटी बरांडी, चैड़, चूरट, सियोग, सतलुज से पीने के पानी की आपूर्ति हो रही है। कंपनी क्लोरीनेशन के जरिये इस पानी को शुद्ध करती है। इसके अलावा संजौली में अल्ट्रा वायलेट ट्रीटमेंट तकनीक से भी पानी शुद्ध किया जा रहा है। कंपनी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अलावा एनआईवी पुणे से भी इन योजनाओं के पानी की जांच करवा रही है। जांच में इनका पानी पीने लायक है। कंपनी ने योजनाओं का पानी ही पीने की सलाह दी है।



पीने के लिए इस्तेमाल न करें पानी
पेयजल कंपनी हर साल राजधानी में स्थित बावड़ियों के पानी के सैंपल जांच के लिए भेजती है। इनमें ज्यादातर के सैंपल लगातार फेल आ रहे हैं। इस बार भी यह सैंपल फेल हुए हैं। लोगों से अपील हैं कि इनका पानी पीने के लिए इस्तेमाल न करें। कंपनी ने इस बारे में एडवाइजरी भी सभी बावड़ियों में अंकित कर दी है।
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-आदर्श चौहान, सहायक अभियंता, पेयजल कंपनी शिमला



पीने के पानी को लेकर बरतें सतर्कता
शहर के लोग पीने के पानी को लेकर सतर्क रहें। बावड़ियों का पानी सीधे तौर पर पीने के लिए इस्तेमाल न करें, जिनके सैंपल फेल हैं, उनका पानी नहीं पीना चाहिए। इसके अलावा अन्य योजनाओं से भी जो पानी आ रहा है, उसे भी उबालने के बाद ही पीने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
-डॉ. अमित सचदेवा, प्रोफेसर कम्युनिटी मेडिसिन आईजीएमसी
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