मामले रफादफा नहीं किए जाने चाहिए और न ही किसी प्रकार के दबाव के चलते इनमें समझौता किया जाना चाहिए। शीघ्र न्याय के लिए फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिए। अधिनियम के तहत पीड़ित व्यक्ति निजी अधिवक्ता की सेवाएं भी ले सकता है।
उन्होंने राज्य सरकार के अधिकारियों से कहा कि अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए धन का उपयुक्त आवंटन किया जाना चाहिए। पूरी राशि को इनके कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए।
उन्होंने हिमाचल में इन वर्गों के कल्याण के लिए किए जा रहे कार्यों पर संतोष जताया। उधर, मुख्य सचिव ने समिति को अवगत करवाया कि प्रदेश में राज्य अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति विकास निगम की स्थापना की गई है। इसके माध्यम से इन वर्गों के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं।
समिति के अन्य सदस्यों में डॉ. रामचरितर निशाद, डॉ. पीके बीजू, अंजू बाला, राम कुमार वर्मा, डीआर शेखर, शमशेर सिंह ढुलो, प्रो. सीताराम अजमीरा नायक, प्रतिमा मंडल, मुकेश कुमार और एल सिंगसन भी बैठक में मौजूद रहे।
बैठक के दौरान मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने बताया कि राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी 25.19 प्रतिशत जबकि अनुसूचित जनजाति की आबादी 8.88 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत राज्य बजट का 25.19 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है।
वर्ष 2018-19 के लिए 1586.97 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसी प्रकार जनजातीय उपयोजना के तहत 2017-18 के दौरान 65 करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई है।