Satyanand Stokes Jayanti: सत्यानंद स्टोक्स का जन्म 16 अगस्त 1882 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया में हुआ था। 1904 में भारत आने के बाद वह हिमाचल के कोटगढ़ क्षेत्र में बस गए। वर्ष 1916 में उन्होंने अमेरिका से Delicious किस्म के सेब के पौधे लाकर यहां खेती शुरू की। बाद में उन्होंने स्थानीय किसानों को भी सेब की खेती के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा और सामाजिक सुधार में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। पढ़ें पूरी खबर...
हिमाचल प्रदेश की पहचान आज सेब के बागानों और बागवानी से होती है, लेकिन पहाड़ों में व्यावसायिक सेब की खेती को नई दिशा देने वाले व्यक्ति का नाम बहुत कम लोग जानते हैं। यह नाम है सत्यानंद स्टोक्स। 16 अगस्त 1882 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया में जन्मे स्टोक्स ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा हिमाचल की पहाड़ियों में बिताया और यहां की अर्थव्यवस्था को बदलने वाली सेब की खेती की नींव मजबूत की।
हिमाचल में सेब की खेती की नींव रखने वाले महान दूरदर्शी सत्यानंद स्टोक्स जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
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उन्होंने पहाड़ों में सेब की खेती को बढ़ावा देकर हिमाचल की बागवानी को नई पहचान दिलाई और लाखों किसान-बागवान परिवारों के लिए समृद्धि एवं आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया।… pic.twitter.com/Qee0n0dXWV
— Sukhvinder Singh Sukhu (@SukhuSukhvinder) August 16, 2026
सत्यानंद स्टोक्स का जन्म सैमुअल इवान स्टोक्स जूनियर के रूप में हुआ था। वर्ष 1904 में महज 22 साल की उम्र में वह अमेरिका से भारत आए। शुरुआत में उन्होंने शिमला की पहाड़ियों में कुष्ठ रोगियों की सेवा का काम किया। बाद में उनका जीवन हिमाचल के कोटगढ़ और ठियोग क्षेत्र से गहराई से जुड़ गया।
अमेरिका से लाए सेब के पौधे
स्टोक्स को हिमाचल में आधुनिक व्यावसायिक सेब की खेती का अग्रदूत माना जाता है। वर्ष 1916 में उन्होंने अमेरिका से Delicious किस्म के सेब के पौधों की रोपाई कोटगढ़ क्षेत्र में की। हिमाचल प्रदेश के कृषि संबंधी अध्ययनों में भी कोटगढ़ से व्यावसायिक सेब उत्पादन के विस्तार और इसमें सत्यानंद स्टोक्स की भूमिका का उल्लेख मिलता है।
इन पौधों की पैदावार अच्छी हुई तो आसपास के किसानों ने भी सेब की खेती अपनानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे कोटगढ़, ठियोग, नारकंडा और शिमला के दूसरे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के बाग फैलने लगे। इसके बाद यही खेती हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती चली गई।
सिर्फ सेब नहीं, किसानों की सोच भी बदली
स्टोक्स का योगदान केवल अपने खेत में सेब उगाने तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्थानीय किसानों को भी सेब की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी सफलता देखकर किसानों को भरोसा हुआ कि पहाड़ी जमीन पर पारंपरिक खेती के अलावा बागवानी भी अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है।
आज शिमला, किन्नौर, कुल्लू और राज्य के अन्य हिस्सों में फैले विशाल सेब बागानों के पीछे इसी बदलाव की लंबी कहानी है। हिमाचल में सेब की खेती ने गांवों की अर्थव्यवस्था, रोजगार और जीवनशैली पर भी गहरा प्रभाव डाला।
अमेरिका से आए, हिमाचल के होकर रह गए
स्टोक्स का हिमाचल से रिश्ता केवल खेती तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्थानीय परिवार में विवाह किया और कोटगढ़ क्षेत्र में बस गए। बाद में उन्होंने हिंदू धर्म अपनाया और सत्यानंद नाम धारण किया।
वह स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया और जेल भी गए। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया और कोटगढ़ में अपने बेटे तारा की स्मृति में तारा स्कूल की शुरुआत की।
इसलिए याद किए जाते हैं 'हिमाचल के एप्पल मैन'
सत्यानंद स्टोक्स का निधन 14 मई 1946 को हुआ, लेकिन उनका योगदान आज भी हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में दिखाई देता है। सेब की पेटियों से लेकर आधुनिक हाई-डेंसिटी बागानों तक हिमाचल की बागवानी ने लंबा सफर तय किया है, लेकिन इस बदलाव की शुरुआती महत्वपूर्ण कड़ी कोटगढ़ में स्टोक्स द्वारा की गई सेब की खेती थी।
इसी वजह से सेब उत्पादक उन्हें 'हिमाचल का एप्पल मैन' भी कहते हैं। कई वर्षों से किसान और बागवान उनकी जयंती को एप्पल डे के रूप में मनाने और उनके योगदान को औपचारिक रूप से सम्मानित करने की मांग भी करते रहे हैं।
आज उनकी जयंती पर सत्यानंद स्टोक्स को याद करना सिर्फ एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस बदलाव को याद करना है जिसने हिमाचल के पहाड़ों में सेब को एक फल से बढ़ाकर हजारों परिवारों की आजीविका बना दिया।