बोले, जड़ों से जुड़े बिना कोई राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। राजकीय संस्कृत महाविद्यालय फागली में वीरवार को ग्रंथ लोकार्पण-सारस्वत उत्सव का आयोजन किया गया। इस शैक्षणिक अनुष्ठान में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रयास किया गया। आयोजन में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. महावीर सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, यह एक विचार प्रणाली है। संस्कृत वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपनी परंपराओं, विज्ञान, चिकित्सा, गणित, खगोल शास्त्र और नीति का गहन अध्ययन कर सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि अपनी जड़ों से जुड़े बिना कोई राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता। उन्होंने आधुनिक युवाओं को संस्कृत के अध्ययन के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि जब भारत वैश्विक मंच पर सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, तब हमारी प्राचीन भाषा और ज्ञान-परंपरा की पुन : प्रतिष्ठा आवश्यक है। इस आयोजन में विद्यार्थियों, शिक्षकों और अतिथियों ने भाग लिया। इस अवसर पर प्रो. सुज्ञान कुमार माहातिं ने संपादित ग्रंथों भासवती, पयस्वती, सरस्वती का लोकार्पण किया गया। इन ग्रंथों के प्रकाशन का उद्देश्य मात्र शैक्षणिक प्रगति के साथ भारतीय भाषिक और सांस्कृतिक अस्मिता से नई पीढ़ी को अवगत करवाना था। महाविद्यालय के व्याकरण आचार्य डॉ. अजय भारद्वाज की पाणिनि शिक्षा का भी लोकार्पण किया गया। प्रो. सुज्ञान कुमार माहातिं ने कहाकि आज का यह आयोजन केवल एक लोकार्पण नहीं, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनरावृत्ति का सूचक है।
इस अवसर पर डॉ. भवानी सिंह (विशिष्ट अतिथि) ने आधुनिक संदर्भ में संस्कृत की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। आज की पीढ़ी को यह जानना आवश्यक है कि संस्कृत कोई मृत भाषा नहीं, बल्कि यह एक सजीव परंपरा की संवाहिका है। इस आयोजन में डॉ. ज्ञान चंद चौहान, डॉ. मुकेश कुमार शर्मा, डॉ. रामेश्वर दत्त और किरण शर्मा ने हिस्सा लिया। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत और संस्कृत गीतिका ने पूरे आयोजन को गरिमा प्रदान की। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मुकेश शर्मा ने कहा कि यह आयोजन महाविद्यालय की प्रतिबद्धता का परिणाम है। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि संस्कृत पुनः जीवन के केंद्र में लौट रही है।