मशहूर लेखक सलमान रुशदी का सोलन के शिल्ली रोड पर अपना बंगला (अनीश विला) है। उपायुक्त रेजिडेंस के समीप इस बंगले में 14 कमरे हैं। इनमें छह बड़े कमरे, बेड रूम, हॉल, किचन और टॉयलेट हैं। रुशदी आखिरी बार वर्ष 2002 में यहां आए थे। वह केयर टेकर गोविंद राम से कह गए थे कि बंगले की देखभाल करते रहना। इसकी मरम्मत के लिए समय-समय पर पैसा भेजता रहूंगा, मगर 2015 के बाद न तो मरम्मत के लिए कोई पैसा आया और न ही गोविंद का वेतन।
गोविंद की पत्नी व्यासो देवी ने बताया कि 2002 में सोलन से जाने के बाद रुशदी ने न तो फोन किया और न ही उनका कोई रिश्तेदार आया। वह मंडी के जोगिंद्रनगर के रहने वाले हैं। 2015 तक 8,000 रुपये वेतन अकाउंट में आता रहा। उसके बाद पैसा आना बंद हो गया। बंगले की हालत खराब होती गई। वह खुद मरम्मत करवाते रहे। सात साल से बिजली-पानी का बिल खुद भर रहे हैं। दो कमरों की हालत खराब है। इसमें बरसात में पानी आ रहा है। सीलन भी आ रही है। उन्होंने कहा कि रुशदी पर हमले के बारे में बीते दिन पड़ोसियों से पता चला। गौर रहे कि सलमान रुशदी पर अमेरिका के न्यूयार्क में शुक्रवार को एक कार्यक्रम में हमला हुआ।
मजदूरी से चला रहे परिवार
व्यासो देवी ने बताया कि उनके पति परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी कर रहे हैं। जब से पैसा आना बंद हुआ, तब से दिहाड़ी लगाकर परिवार पाल रहे हैं।
1997 में मिला था बंगला
व्यासो देवी ने बताया कि सलमान रुशदी के साथ उनके वकील भी आए थे। 14 कमरों का अनीश विला पांच साल कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद वर्ष 1997 में हासिल किया था। रुशदी वर्ष 2002 में हिमाचल सरकार से मुकदमा जीतने के बाद पहली बार सोलन आए थे तो वह इसमें किताबों का संग्रह रखने की बात करते थे। अनीश विला को उनके पिता मुहम्मद अनीस अहमद ने वर्ष 1969 में उनको तोहफे में दिया था। सलमान रुशदी ने इस घर में एक रात गुजारी थी। अपने वकील विजय एसटी शंकर दास से कहा था कि वह इसे एक लेखक गृह और लाइब्रेरी में तबदील करना चाहते हैं, लेकिन यह वादा पूरा नहीं हो पाया। लेखक गृह बनाना तो दूर रुशदी इस घर की मरम्मत तक नहीं करवा पाए।
वर्ष 1927 में हुआ था अनीश विला का निर्माण
जानकारी के अनुसार अनीश विला का निर्माण 1927 में किया गया था। इसे बाद में रुशदी के दादा ने खरीदा। उसके बाद अनीस अहमद के नाम होने के बाद 1953 से 1969 के दौरान इस संपत्ति को यह कहकर अनाम घोषित कर दिया गया कि इसके मालिक पाकिस्तान चले गए। इसके बाद इस भवन पर कभी प्रदेश के शिक्षा विभाग तो कभी सरकारी अफसरों का कब्जा हो गया। 1992 में सलमान रुशदी ने इस भवन पर अपना दावा ठोका। साबित किया कि वे असली मालिक हैं।