अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के दूसरे दिन शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में आदिवासी लेखकों के समक्ष चुनौतियां विषय पर चर्चा हुई। आदिवासी लेखकों का प्रकाशक और वित्तीय सहायता नहीं मिलने का दर्द छलका। लेखकों ने स्कूल और घर की भाषा अलग-अलग होने को भी एक बड़ी चुनौती माना। आदिवासी लेखक मदन मोहन सोरेन ने कहा कि आदिवासी लेखकों को साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए प्रकाशक सहयोग नहीं करते हैं। उन्होंने साहित्य अकादमी से आदिवासी भाषाओं को भी प्राथमिकता देने की मांग उठाई। कवि चंद्रकांत मुरा सिंह ने कहा कि हमारे साहित्य को पढ़ने वाले लोगों की संख्या काफी कम होती है। पाठक तलाशने के लिए अंग्रेजी या हिंदी भाषा में अपने साहित्य का अनुवाद करना पड़ता है।
खासी कवयित्री, नाटककार और आलोचक स्ट्रीमलेट दखार ने कहा कि जब तक साहित्य अकादमी उनकी भाषा को मान्यता नहीं देती, तब तक उनकी समस्या ऐसे ही रहेगी। उन्होंने आदिवासी भाषाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि असली साहित्य स्थानीय भाषाओं में ही लिखा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज के समय में साहित्य सिर्फ ग्लोबल भाषा अंग्रेजी में ही बिक रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता बोडो लेखक अनिल बर ने की। उन्होंने कहा कि आदिवासी भाषा साहित्य के पाठक बहुत कम है। इन्हें बढ़ावा देने के लिए साहित्य अकादमी और सरकार को कदम उठाने चाहिए। आदिवासी लेखक उर्मिला कुमरे और ज्योति नायक राठौर ने भी विचार रखे।