शोध के लिए शिमला और सोलन से 111 बच्चों के सैंपल लिए गए थे।
हिमाचल में रोटा वायरस के कारण बच्चे डायरिया की चपेट में आ रहे हैं। राज्य में डायरिया से पीडि़त पचास फीसदी बच्चों में रोटा वायरस का संक्रमण पाया गया है। आईजीएमसी शिमला और जेपी विश्वविद्यालय वाकनाघाट के संयुक्त शोध में यह खुलासा हुआ है। शोध के लिए शिमला और सोलन से 111 बच्चों के सैंपल लिए गए।
इनमें जी 1 पी 6 स्ट्रेन का वायरस ज्यादा मिला है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने हिमाचल समेत चार राज्यों में रोटा वायरस के उन्मूलन के लिए वैक्सीन हाल ही में लॉन्च की थी। यह वैक्सीन जी 1 स्ट्रेन को खत्म करने के लिए बनाई गई है। भविष्य में प्रदेश के बच्चों की असमय मौत का प्रमुख कारण रहे डायरिया को नियंत्रित करने में यह वैक्सीन कारगर साबित हो सकती है।
दोनों संस्थानों के इस संयुक्त अध्ययन के लिए शोधार्थियों ने शिमला और सोलन से बच्चों एवं बड़ों के स्टूल (विष्ठा) के नमूने लिए। नमूनों में रोटा वायरस, नोरो वायरस और एंट्रो वायरस की मौजूदगी की पड़ताल की गई। कुल 287 नमूनों में से 111 नमूने बच्चों और 176 बड़ों के थे।
आरटी-पीसीआर विधि से प्रयोगशालाओं में इन नमूनों की जांच में पाया गया कि बच्चों के 49.5 और बड़ों के 14.8 फीसदी नमूनों में रोटा वायरस था। बच्चों-बड़ों के महज 5.6 फीसदी नमूनों में एंट्रो वायरस और 1.4 फीसदी नमूनों में नोरो वायरस था। पांच साल से कम आयु के बच्चों के नमूनों में रोटा वायरस ही ज्यादा पाया गया।