कई स्थानों पर उद्योगों के भीतर प्रयोग में लाने वाली मशीनरी में भी धुआं उठता है। इसमें पाया गया कि अगर इसी वातावरण में कुछ वर्षों तक कामगार कार्य करते रहे तो इन्हें भयानक बीमारियां घेर सकती हैं। इसमें सबसे अधिक खतरा फेफड़ों के फेल होने का है। यह शोध इलेक्ट्राॅनिक, प्लास्टिक का सामान, स्क्रू बनाने वाले और फार्मा उद्योगों में किया गया। बीमारी के बाद कामगारों की कर दी जाती है छुट्टीशोध के दौरान पाया गया कि बीमारी के दौरान कामगारों की छुट्टी कर दी जाती है। ऐसे में उन्हें काफी दिक्कतें आती हैं। शोध में पाया गया कि अगर कोई गंभीर बीमारी हो जाए तो संबंधित कामगार को अधिकतम दो हफ्ते की छुट्टी देने से भी काम चल सकता है। क्योंकि इस अवधि में टीबी समेत कई अन्य प्रकार का बैक्टीरिया कम हो जाता है और फैलने की आशंका भी कम हो जाती है।
सात स्तरों पर उद्योगों को देना होगा ध्यान-क्रॉस वेंटिलेशन
-छोटे कक्ष को बड़े हॉल में तबदील करना।
-एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम लगाना।
-धुआं रहित वातावरण तैयार करना।
-धुआं करने वाली मशीनों की समय पर मरम्मत।
-हवा शुद्ध करने के लिए स्पाइडर, एलोवेरा, स्नेक प्लांट लगाना।
-उद्योगों से निकलने वाले वेस्ट को सही प्रकार से ठिकाने लगाना।
उद्योगों में वातावरण शुद्धता को लेकर एक शोध किया गया है। इसमें कई प्रकार के खुलासे हुए हैं। प्रदेश के करीब 10 उद्योगों में शोध किया गया है। अगर उद्योगों का वातावरण ठीक हो जाए तो कामगारों को बीमारियां नहीं लगेंगी। इस शोध को राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र नई दिल्ली ने भी चुना है। इस शोध को नौणी विवि के पर्यावरण विज्ञान के एचओडी डॉ. एसके भारद्वाज की मदद से पूरा किया गया है।-डॉ. एके सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी (स्वास्थ्य)।