ब्लॉक फाॅरेस्ट ऑफिसर (बीएफओ) संतोष ठाकुर ने बताया कि इस क्षेत्र में पहले भी हिमालयी भूरे भालू देखे गए हैं, लेकिन पहली बार मादा भालू अपने दो शावकों के साथ साफ तस्वीरों में दिखाई दी है। इससे पता चलता है कि अभयारण्य का वातावरण इस प्रजाति के लिए सुरक्षित और अनुकूल है। हिमालयी भूरा भालू हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों के सबसे बड़े स्तनधारी जीवों में माना जाता है। यह सर्वाहारी प्रजाति है, जो वनस्पतियों, जड़ों, कीटों और छोटे जीवों तक विभिन्न प्रकार के भोजन पर निर्भर रहती है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सूंघने की क्षमता अत्यंत तीव्र होती है और यह कई किलोमीटर दूर तक गंध पहचान सकता है।
उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में बीजों के प्रसार के माध्यम से यह प्रजाति जैव विविधता संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। पक्षी विशेषज्ञ गैरी भट्टी के मुताबिक, लाहौल के बाद अब रकछम-छितकुल क्षेत्र हिमालयी भूरे भालुओं के लिए प्राकृतिक आवास बनकर उभर रहा है। इससे प्रकृति पर्यटन, पक्षी अवलोकन और वन्यजीव फोटोग्राफी को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। वन्यजीव मंडल सराहन के उप वन संरक्षक अशोक नेगी ने बताया कि इससे पहले वर्ष 2016-17 में भी यहां हिमालयी भूरे भालू का रिकॉर्ड दर्ज किया गया था। उन्होंने वन विभाग की टीम के संरक्षण कार्यों की सराहना की।