कुछ ही दिन बाद पठानिया के विस क्षेत्र के रहने वालेे राजीव भारद्वाज को केसीसी बैंक का चेयरमैन पद दिया गया। हैरत इस बात की थी कि पिछले विस चुनाव में राजीव भाजपा को अपने ही बूथ से लीड नहीं दिला पाए थे।
जानकार मान रहे हैं बिना किसी बड़े ओहदे के पठानिया कांगड़ा में बड़े सियासी चेहरे के रूप में उभर कर सामने आए जिसके चलते अपनों के बीच उनका राजनीतिक संघर्ष बढ़ गया।
इस पूरे सियासी घटनाक्रम ने पिछले 25 वर्ष में कम से कम शांता के बाद कांगड़ा से मुख्यमंत्री पद का दावेदार होने की संभावनाओं पर विराम जरूर लगा दिया है। चार मंत्रियों में सबसे वरिष्ठ किशन कपूर और सरवीण चौधरी हैं। इसलिए, इनको विभाग ही भविष्य में संभावित आपसी मनमुटाव वाले मिले।
कुछ महीने पहले कांगड़ा एयरपोर्ट पर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के समक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों के चलते दोनों मंत्रियों के बीच आपसी मनमुटाव खुले तौर पर उजागर हुआ। नगर निगम धर्मशाला के चुनाव में भी दोनों के बीच सियासी खींचतान दिखी।
विपिन परमार और बिक्रम ठाकुर पहली बार मंत्री बने। जब शुरू में हाईकमान ने अपरोक्ष रूप से कांगड़ा की अगुवाई की कमान विपिन परमार के हाथ में थमाई तो वरिष्ठ नेताओं की आंख में वह खटकने लगे। रार धीरे-धीरे बढ़ती गई।
सियासी दखल के चलते परमार और राकेश पठानिया के बीच राजनीतिक रिश्ते बिगड़ने लगे। धूमल के करीबी मंत्री बिक्रम ठाकुर को उनके ही पड़ोसी निर्दलीय विधायक होशियार सिंह ने सीमेंट के दामों पर घेर लिया।
यह वही होशियार सिंह हैं जिन्हें सीएम जयराम हर मंच से अपनी ही सरकार का एसोसिएट विधायक कहकर सीना ठोकते हैं। देहरा में कुछ महीने पहले हुए रोड शो में सीएम ने रविंद्र रवि के बजाय होशियार सिंह को अपनी जीप में बैठाया था। होशियार सिंह कांगड़ा में होने वाले सीएम के हर कार्यक्रम में शरीक होते हैं।
वीरभद्र और धूमल के कार्यकाल में कांगड़ा के नेताओं को लड़ाने की कोशिश जरूर हुई। अब जयराम सरकार के कार्यकाल में भी वही परंपरा शुरू हुई है। लेकिन, कांगड़ा के नेताओं को खुद समझ होनी चाहिए कि उन्हें आपस में लड़ना है या एकजुट होकर किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे करना चाहिए।
- विप्लव ठाकुर, कांगड़ा से राज्यसभा सांसद एवं पूर्व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष