यह तब था जब पीड़िता कह रही थी कि दुष्कर्म करने वाले अधेड़ उम्र के लोग थे। लेकिन पीड़िता की दलीलों और आरोपों के बावजूद पुलिस की जांच किसी और ही दिशा में जाती रही। यही नहीं, अभी तक पुलिस जांच को इस बात के बहाने आगे बढ़ाने से बच रही थी कि पीड़िता सहयोग नहीं कर रही है।
इधर, पुलिस सूत्रों की मानें तो अगर पुलिस जांच करना चाहती तो पीड़िता के आरोपों को गलत या सही साबित करने के लिए उस इलाके के मोबाइल टावरों से घटना के समय के आसपास एक्टिव रहे मोबाइल फोनों को चिह्नित कर सकती थी।
नाम न लिखने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि वह इलाका ज्यादा चहल पहल वाला नहीं है, ऐसे में जांच के दायरे में कुछ ही लोग आते। जिससे जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाने में फायदा मिल सकता था। लेकिन पुलिस ने पूरा जोर इस बात पर दिया कि वह जांच में सहयोग नहीं कर रही है और और सीसीटीवी फुटेज से उसकी कहानी गलत साबित हो रही है। आमतौर पर दुष्कर्म जैसे मामलों में जांच का जिम्मा महिला अफसरों को ही दिया जाता है।
इससे न सिर्फ पीड़िता को बात करने में सुविधा होती है बल्कि असुरक्षा का भाव भी नहीं रहता, लेकिन पुलिस की एसआईटी में निचले स्तर पर महिला कर्मचारी रखी गईं, यही नहीं, अब तक उन पुलिस कर्मियों पर भी कार्रवाई नहीं की गई। जिन्होंने पीड़िता की शिकायत को नजरंदाज किया। ऐसे में पीड़िता के आरोपों को खारिज करना अब सरकार और पुलिस दोनों के लिए आसान नहीं है।