फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शिमला दुष्कर्म मामला: पुलिस ने पीड़िता के परिचितों के सैंपल ही डीएनए को भेज दिए

Thu, 16 May 2019 10:29 AM IST
Krishan Singh प्रखर दीक्षित, अमर उजाला, शिमला
विज्ञापन
विज्ञापन

राजधानी में दुष्कर्म कांड की जांच में जुटी स्मार्ट पुलिस ने एक के बाद एक कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे साफ हो रहा है कि दाल में कुछ काला है और पुलिस जांच सही दिशा में नहीं जा रही थी। पुलिस की जांच शुरू से ही संदेह पैदा करने वाली रही।

विज्ञापन


दुष्कर्म पीड़िता के खुलकर सामने आने के बाद इस बात का भी खुलासा हुआ है कि उसके आरोपों को सीसीटीवी फुटेज का हवाला देकर सिरे से नकारने वाली पुलिस ने फोरेंसिक जांच के तौर पर पीड़िता के स्पर्म सैंपल को भेजने में देर कर दी। 

इसके बाद जब सैंपल भेजा और उसमें किसी अन्य व्यक्ति के अधिकतम 72 घंटे तक पुराने डीएनए के मिलने की पुष्टि हुई तो बजाय पीड़िता के बताए हुलिये वाले लोगों को पकड़ने के पुलिस ने उसके ही दोस्त समेत चार परिचितों के सैंपल लेकर डीएनए मिलान के लिए फोरेंसिक लैब को भेज दिए। 

विज्ञापन

पीड़िता की दलीलों को दरकिनार कर कहीं और ही गई जांच

यह तब था जब पीड़िता कह रही थी कि दुष्कर्म करने वाले अधेड़ उम्र के लोग थे। लेकिन पीड़िता की दलीलों और आरोपों के बावजूद पुलिस की जांच किसी और ही दिशा में जाती रही। यही नहीं, अभी तक पुलिस जांच को इस बात के बहाने आगे बढ़ाने से बच रही थी कि पीड़िता सहयोग नहीं कर रही है।

इधर, पुलिस सूत्रों की मानें तो अगर पुलिस जांच करना चाहती तो पीड़िता के आरोपों को गलत या सही साबित करने के लिए उस इलाके के मोबाइल टावरों से घटना के समय के आसपास एक्टिव रहे मोबाइल फोनों को चिह्नित कर सकती थी। 
विज्ञापन

जांच टीम में नहीं रखी कोई महिला अधिकारी

नाम न लिखने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि वह इलाका ज्यादा चहल पहल वाला नहीं है, ऐसे में जांच के दायरे में कुछ ही लोग आते। जिससे जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाने में फायदा मिल सकता था। लेकिन पुलिस ने पूरा जोर इस बात पर दिया कि वह जांच में सहयोग नहीं कर रही है और और सीसीटीवी फुटेज से उसकी कहानी गलत साबित हो रही है। आमतौर पर दुष्कर्म जैसे मामलों में जांच का जिम्मा महिला अफसरों को ही दिया जाता है।

इससे न सिर्फ पीड़िता को बात करने में सुविधा होती है बल्कि असुरक्षा का भाव भी नहीं रहता, लेकिन पुलिस की एसआईटी में निचले स्तर पर महिला कर्मचारी रखी गईं, यही नहीं, अब तक उन पुलिस कर्मियों पर भी कार्रवाई नहीं की गई। जिन्होंने पीड़िता की शिकायत को नजरंदाज किया। ऐसे में पीड़िता के आरोपों को खारिज करना अब सरकार और पुलिस दोनों के लिए आसान नहीं है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें