चंबा-जोत मार्ग पर मंगला के पास पहाड़ी दरकने से मलबे में दबे पोकलेन ऑपरेटर की तलाश में उसका चाचा पिछले 11 दिनों से आंखों में आंसू दिन रात पोकलेन मशीन चलाता रहा। रोजाना सुबह इसी आस में वह मशीन पर बैठता कि आज शायद उसे उसका भतीजा मिल जाएगा। लेकिन देर रात तक नाले से मलबा हटाने के बाद भी जब रात को उसे निराशा मिलती तो वह आंखों में आंसू भरकर दर्द को कम करने की कोशिश करता।
करीब 11 दिन तक वह भतीजे की तलाश करने के लिए लगातार पोकलेन मशीन चलाता रहा। जबकि अन्य मशीनों के ऑपरेटर उसे आराम करने के लिए भी बोलते लेकिन वह आराम करने की बजाए लापता भतीजे की तलाश में काम करता रहता था। उसके मन में यही उम्मीद थी कि मलबे में दबा उसका भतीजा शायद जिंदा होगा। इसलिए वह कोशिश करता रहता है कि जल्द उसे मलबे से ढूंढ निकाले।
लेकिन जैसे-जैसे दिन व्यतीत होने लगे उसकी आस भी टूटने लगी। पांच दिन के बाद जब एनडीआरएफ की टीम ने अपने हाथ खड़े कर दिए, तब उसकी उम्मीद भी टूटने लगी। लेकिन भतीजे के प्रति चाचा के प्यार ने कहीं न कहीं एक उम्मीद जगाई रखी। 11वें दिन सुबह के समय जब मलबे में दबी मशीन का एक हिस्सा नजर आया तो सबसे पहले लापता ऑपरेटर का चाचा भतीजे को देखने के लिए वहां पहुंचा।
जैसे ही मशीन से मलबा हटा तो उसका भतीजा वहां मृत अवस्था में पड़ा था। चाचा भतीजा लंबे समय से एक साथ काम कर रहे थे। उन्होंने मिलकर चंबा में ही कई सड़कें बनाई। हादसे के दौरान भी दोनों एक साथ काम कर रहे थे। इतना ही नहीं चाचे ने ही भतीजे को पोकलेन मशीन चलाना सिखाया था। यह सोच-सोच कर चाचा का रो-रो कर बुरा हाल है।