प्रदेश में वैसे तो पूरा वर्ष मटर की खेती होती है लेकिन जो किसान मध्य ऋतु में मटर की बुआई करने जा रहे हैं, वे नवंबर के शुरू समय तक खेत तैयार करने का कार्य को पूरा कर लें। इसके बाद 15 नवंबर तक खेतों में बीज डालने का कार्य कर सकते हैं। मटर की फसल प्रदेश में रबी मौसम की मुख्य नकदी फसल है और ये सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है।
मटर की अच्छी किस्मों से 8-16 क्विंटल तक उत्पादन प्रति बीघा से लिया जा सकता है। प्रदेश में मटर की फसल के तहत 23900 हेक्टेयर क्षेत्र आता है जो प्रदेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक है। प्रदेश में 2.71 लाख मीट्रिक टन उत्पादन प्रतिवर्ष मटर का उत्पादन हो रहा है।
यह है बिजाई का समय
क्षेत्र अगेती किस्में मध्य ऋतु की किस्में
निचले पर्वतीय क्षेत्र सितंबर-अक्तूबर नवंबर
मध्य पर्वतीय क्षेत्र सितंबर (पहला पखवाड़ा) नवंबर
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र मार्च-जून अक्तूबर-नवंबर
कितना लगाएं बीज
शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिए 10 से 12 किलोग्राम प्रति बीघा। मध्य तथा देर से पकने वाली किस्मों के लिए 5-6 किलोग्राम प्रति बीघा लगाना चाहिए। अगेती किस्मों के लिए 30 गुणा 7.5 सेंटीमीटर और मध्य और देर से पकने वाली किस्मों की 60 गुणा 7.5 सेंमी. की दूरी रखें।
यह है मटर बिजाई का सफल तरीका
मटर स्वपरागित फसल है, उत्तम बीज तैयार करने के लिए विभिन्न किस्मों के मध्य 10 से 25 मीटर की दूरी आवश्यक है। रोग ग्रस्त और दूसरी किस्मों के पौधों को उखाड़ दें। बड़े आकार के दाने प्राप्त करने के लिए पौधों को पर्याप्त नमी मिली चाहिए। शीघ्र सूखकर तैयार होने वाली किस्मों की बार-बार सिंचाई आवश्यक है। सर्दियों में पाला और ठंड से बचाव के लिए उपयुक्त नमी बनाए रखें।
24 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में होती है खेती
डॉ. वाईएस नौणी के सब्जी विभाग के वैज्ञानिक डॉ. योगराज शुक्ला ने बताया कि मटर की खेती प्रदेश के निचले मैदानी क्षेत्रों से लेकर लाहौल, किन्नौर, चंबा के कोल्ड डेजर्ट कहे जाने वाले क्षेत्रों में भी की जाती है। प्रदेश में 23 हजार 900 हेक्टेयर क्षेत्र में 2.71 लाख मीट्रिक टन उत्पादन किया जा रहा है।