कचालू के पत्तों से बनाए जाते हैं पतीड़, डगैली पर्व पर पूजा में होते हैं इस्तेमाल
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क्योंथल में अरबी के पत्तों से बनाए जाते हैं कई व्यंजन
संवाद न्यूज एजेंसी जुन्गा (शिमला)। कचालू (अरबी) के पत्तों से बने पतीड़ बरसात के मौसम में हर रसोई की स्पेशल डिश होती है। इसे लोग बड़े चाव से खाते हैं। सर्दियों में जहां अरबी की सब्जी और मक्की की रोटी का हर रसोई में उपयोग किया जाता है। वहीं बरसात में अरबी के पत्ते से बनाए जाने वाले पतीड़ और पकौड़े बहुत की स्वादिष्ट तथा लजीज होते हैं।
विशेषकर बरसात के दिनों में शिमला जिले के क्योंथल क्षेत्र में अरबी के पत्तों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के व्यंजन तैयार करने में किया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे धीधड़े भी कहा जाता है। इसे विशेषकर देसी घी अथवा दही से खाए जाते हैं। डगैली अर्थात डगवांस के पर्व पर क्योंथल क्षेत्र के अलावा जिला सिरमौर तथा सोलन क्षेत्र में पतीड़ बनाने की विशेष प्रथा है जिसे रात्रि को मकान की दहलीज पर रखकर धारधार औजार से काटकर डायनों को अर्पित किया जाता है।
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जुन्गा क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक दयाराम वर्मा, बालक राम निर्मोही और योगमाया शर्मा ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में पतीड़ बनाने की परंपरा कालांतर से चली आ रही है। अतीत में बुआरा अथवा किसी सामूहिक कार्य के दौरान लोगों को अरबी के पत्तों पर भोजन परोसा जाता था। अरबी के पत्ते साइज में बड़े होते हैं। इसके अतिरिक्त अतीत में अनाज का जब काफी अभाव को जाता था तो लोग पतीड़ बनाकर गुजारा करते थे। पतीड़ बनाने के लिए सबसे पहले पत्तों को अच्छी से धोया जाता है। बेसन या मक्की के आटे में नमक, मिर्च और अन्य मसाले मिलाकर रख लिए जाते हैं, फिर कचालू के पत्तों पर इसे धीरे-धीरे लगाकर इन्हें लपेट कर रख लिया जाता है। इसके बाद में इन्हें पानी के भाप पर पकाया जाता है।
अरबी के पत्ते औषधीय गुणों से भरपूर : डॉ. जोशी
आयुर्वेद में अरबी के पत्ते को औषधियों गुणों की खान माना जाता है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डाॅ. विश्वबंधु जोशी ने बताया कि अरबी के पत्तों को स्थानीय भाषा में लांबू कहा जाता है, जोकि हार्ट के आकार के होते हैं। अरबी के पत्तों में विटामीन ए, विटामीन सी, आयरन और फोलेट (फोलेट शरीर को स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद करता है) जैसे अनेक तत्व पाए जाते हैं।