भारत में प्रतिवर्ष करीब पांच लाख मीट्रिक टन मशरूम वेस्ट निकलता है। इसमें 1.9 फीसदी नाइट्रोजन, 0.4 फाॅसफोरस और 2.4 फीसदी पोटैशियम होता है, जो भूमि में पोषक तत्वों की कमी को दूर करके उसकी उपजाऊ क्षमता को कई गुणा बढ़ाता है।
मशरूम अपशिष्ट (वेस्ट) से अब नुकसान नहीं, बल्कि कृषि और बागवानी कार्य में लाभ मिलेगा। मशरूम फसल पूरी होने के बाद खुले में फेंके जाने वाले वेस्ट से अब किसान-बागवान ऑर्गेनिक खाद तैयार कर सकते हैं। इसमें खुंब अनुसंधान निदेशालय (डीएमआर) की ओर से किए जा रहा शोध भी सफल रहा है। इसमें 30 दिन में वेस्ट से ऑर्गेनिक खाद तैयार होगी। डीएमआर के विशेषज्ञों की मानें तो मशरूम के वेस्ट में नाइट्रोजन, फासफोरस व पोटाशियम की प्रचुर मात्रा होती है।
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ये मिट्टी को उपजाऊ बनाती है। इसका प्रयोग किसान व बागवान मशरूम अवशिष्टों को री-साइकिल करने के बाद कर सकते हैं। इसके अलावा केंचुआ खाद बनाने में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए मशरूम के वेस्ट को साफ-सुथरी जगह पर गड्ढा खोदकर उसमें 8 से 16 माह तक अच्छी तरह सड़ने के बाद तैयार खाद का ही प्रयोग किया जा सकता है। जबकि खुंब निदेशालय ने अपने प्रारंभिक शोध में तीस दिन में ऑर्गेनिक खाद तैयार कर ने का दावा किया है।
कच्चे अपशिष्ट से भूमि को नुकसान
जागरूकता के अभाव में कई बार किसान व बागवान मशरूम के कच्चे अपशिष्ट ही खेतों में डाल देते हैैं। इससे जमीन को नुकसान भी होता है। मशरूम वेस्ट को खुले में छोड़ने से जहां कई प्रकार की पर्यावरण समस्याएं पैदा होती हैं, वहीं इससे भूजल भी दूषित होता है। इससे कई हानिकारक साल्ट भूमि के नीचे पानी में मिल जाते हैं।
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प्रतिवर्ष निकलता है पांच लाख मीट्रिक टन वेस्ट
भारत में प्रतिवर्ष करीब पांच लाख मीट्रिक टन मशरूम वेस्ट निकलता है। इसमें 1.9 फीसदी नाइट्रोजन, 0.4 फाॅसफोरस और 2.4 फीसदी पोटैशियम होता है, जो भूमि में पोषक तत्वों की कमी को दूर करके उसकी उपजाऊ क्षमता को कई गुणा बढ़ाता है। इसमें मशरूम वेस्ट को पांच फीसदी के हिसाब से खेतों में डालने से भूमि की पोटाशियम व फाॅसफोरस की कमी दूर होगी। इसके अलावा यदि इसे 25 फीसदी के हिसाब से खेतों में मिलाया जाए तो यह नाइट्रोजन की कमी को भी दूर करेगा।
प्रथम चरण का सफल रहा शोध
खुंब निदेशालय सोलन के निदेशक डॉ. वीपी शर्मा ने बताया कि मशरूम वेस्ट का उपयोग, कृषि, बागबानी व भूमि सुधार के लिए किया जा सकता है। निदेशालय ने वेस्ट से तीस दिन में खाद तैयार करने का प्रारंभिक शोध सफल रहा है। इस पर अभी और कार्य किया जा रहा है। इसे और बेहतरीन बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें पानी सोखने की अधिक क्षमता होती है, जिससे खेतों में लंबे समय तक नमी रहती है। इससे किसानों को लाभ मिलेगा।