ज्ञात रहे कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि सरकार इस तरह का आरक्षण देते समय लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती। सरकार की नीति के अनुसार प्रावधान था कि फ्रीडम फाइटर के वैवाहिक पुरुष दो फीसदी आरक्षण के लिए पात्र हैं जबकि यह पात्रता महिलाओं के लिए नहीं थी।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इसे भेदभावपूर्ण ठहराते हुए विवाहित महिलाओं को भी इस आरक्षण के लिए पात्र माना है। प्रार्थी के अनुसार हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का कोई स्थगन आदेश जारी नहीं हुआ है। ऐसे में केवल मामला सुप्रीम कोर्ट में दायर करने के आधार पर उसे हाईकोर्ट के फैसले के तहत जरूरी प्रमाणपत्र जारी होने से नहीं रोका जा सकता।