अफसरों के तंत्र में प्रदेश की जयराम सरकार उलझकर रह गई है। हाल यह है कि पिछली वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में हुए कई घोटालों का चुनावी प्रचार में जिक्र करने वाली भाजपा सत्तासीन होने के चार महीने बाद भी एक भी मामले की जांच नहीं करा सकी है। जिन अफसरों पर पिछली सरकार के दौरान हुए घोटालों का आरोप था, वह अब मुख्यमंत्री के ‘कारखास’ (खास) बने हुए हैं।
जाहिर है, वे अब जांच के आदेश को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। वीरभद्र सिंह की सरकार के दौरान बनी एचपी बीवरेजेस लिमिटेड के गठन को लेकर उस समय भाजपा ने घोटाले का आरोप लगाया था। जयराम ठाकुर की सरकार ने पहली ही कैबिनेट में इस कंपनी को भंग करने का एलान कर दिया।
साथ ही शराब माफिया को फायदा पहुंचाने के कथित आरोप की जांच का भी आदेश जारी कर दिया। कैबिनेट के निर्णय के बावजूद दूसरी एजेंसी तो दूर, विभागीय जांच तक नहीं हो सकी है। कारण यह कि पिछली सरकार में जिस अफसर की सरपरस्ती में यह कंपनी बनी, वह वर्तमान सरकार के बेहद करीबी बन गए हैं।
इसी तरह परिवहन निगम में हुई जरूरत से ज्यादा बसों की खरीद के खेल की जांच भी उस समय के अफसर की वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से नजदीकी होने के चलते प्रभावित हो रही है। इसके अलावा निगम, उद्योग और स्वास्थ्य विभाग के कई मामलों की जांच सरकार चाह कर भी नहीं करा पा रही।
बिना जांच के ही अफसर दे रहे सफाई- सरकार बनने पर मंत्रिमंडल ने उद्योग विभाग की बीमार उद्योगों को मिले लाभ, बीवरेजेस लिमिटेड के घोटाले और गोल्ड रिफाइनरियों को मिली टैक्स में छूट की जांच के आदेश दिए। सूत्रों के अनुसार अफसरों ने बिना जांच के ही मुख्यमंत्री को निर्णय के कारण बता जांच को लगभग ठप ही करा दिया है। हाल यह है कि विजिलेंस को जांच मिलने के बाद भी कोई कार्रवाई शुरू नहीं हो सकी है।