कुश्ती में भविष्य चमकाने के सपने देख रहे खिलाड़ियों के भविष्य पर भी कोरोना का असर पड़ने लगा है। हालात जल्द न सुधरे तो युवा पहलवानों को कुश्ती के खेल से तौबा करनी पड़ सकती है। अमूमन मार्च तथा अप्रैल में प्रदेश के अलावा पंजाब राज्य में भी कहीं न कहीं कुश्ती के अखाड़े सजते रहते हैं। इनमें पहलवानों को भाग लेने का मौका मिलता था। यहां मिलने वाली धनराशि से खुराक का खर्च निकलता था।
कोरोना के कारण देश में लॉकडाउन के बाद पहलवानों के समक्ष अपनी खुराक को पूरा करने का संकट पैदा हो गया है। जिले के गांव चढ़तगढ़ के एक ही परिवार के तीन पहलवान अपने खेत में बनाए अखाड़े में रोज अभ्यास कर कुश्ती स्पर्धाओं की तैयारी में जुटे हैं। 12 बार राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुके साहिल पंडित बताते हैं कि उन्होंने 2016 में हिमाचल कुमार का खिताब जीता था।
इनके भाई राहुल पंडित भी चार बार राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती लड़ चुके हैं। 2019 में बिलासपुर के नलवाड़ में हिमाचल कुमार का खिताब अपने नाम कर चुके हैं। सबसे छोटे प्रिंस भी कुश्ती की प्रदेश स्तरीय स्पर्धा में प्रतिभा दिखा चुके हैं। प्रिंस बताते हैं कि एक शाकाहारी युवा पहलवान की खुराक पर प्रतिदिन पांच से छह सौ रुपये तक का खर्च आता है। हम तीन भाइयों की खुराक को जोड़कर देखें तो तकरीबन दो हजार रुपये प्रति दिन खुराक का खर्च पूरा करना मुश्किल हो गया है।
पिता बलवीर खेतीबाड़ी करते हैं। अपने तीन बेटों की खुराक का इंतजाम करना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। तीनों युवा पहलवानों ने जिला परिषद सदस्य पंकज सहोड़ के माध्यम से जिला प्रशासन, विभिन्न खेल संघों कुश्ती संघ के पदाधिकारियों से मांग की है कि जब तक अखाड़ों में कुश्ती स्पर्धाएं सामान्य रूप से शुरू नहीं हो जाती तब तक उनकी खुराक के लिए आर्थिक मदद दी जाए।