हिमालय में पिघलते ग्लेशियरों का असर इनके आसपास के क्षेत्रों में पेड़-पौधों पर भी पड़ रहा है। निचले क्षेत्रों की कई प्रजातियां ऊपर की ओर सरक रही हैं। यह खुलासा नारडू ग्लेशियर पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन में हुआ है।
इसमें यह बात भी सामने आई कि बास्पा घाटी में पिछले 20 वर्षों में सेब बेल्ट भी अपने स्थान से लगभग 300 मीटर ऊपर सरक गई है। राष्ट्रीय पादप आनुवांशिकी ब्यूरो के प्रधान वैज्ञानिक डा. जेसी राणा ने यह जानकारी शुक्रवार को शिमला में ‘हिमालयन ग्लेशियोलाजी’ सम्मेलन के अंतिम दिन शोध पत्र पढ़कर दी।
डा. राणा ने कहा कि यह स्टडी उत्तरी पश्चिमी हिमालय के तहत आने वाले हिमाचल के किन्नौर की बास्पा वैली में नारडू ग्लेशियर के साथ सटे वनस्पति युक्त क्षेत्र में की गई। इसके लिए 34 स्थलों को चुना गया। ये 1950 मीटर से 4500 मीटर की ऊंचाई पर हैं।
ऐसे हुआ अध्ययन
15 जंगलों में औषधियों के एक, पेड़ों के नौ, झाड़ियों के पांच समुदायों पर स्टडी की गई। पुराने उपलब्ध रिकार्ड से मौजूदा वनस्पतियों की तुलना की गई, तो इनमें अधिकतर पौधों की ऊपर की ओर मूवमेंट देखी गई। इस क्षेत्र में बादल, वर्षा और धुंधयुक्त दिन भी बढ़े हैं। यहां बर्फ भी अब कम और अनियमित गिर रही है। पानी के प्राकृतिक स्रोत भी सूखने लगे हैं।
गंगा समेत 3 नदियों पर अध्ययन की जरूरत
दिल्ली विवि से आए अब्दुल आमिर खान ने अपने शोध पत्र में कहा कि गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी घाटियों में वर्तमान में वर्षा से कितना पानी जुड़ रहा है, इस पर अभी तक कोई विश्वसनीय अध्ययन नहीं हुआ है।
इंदिरा नगर लखनऊ से आए सीवी संगेवार ने अपने शोध में कहा कि हिमालय के ग्लेशियर एल्पस और यूएसए के ग्लेशियरों से अधिक संवेदनशील हैं। ये इनसे अधिक ऊंचाई पर हैं। यहां पर तापमान का वेरिएशन भी ज्यादा है।