सुविधाओं के अभाव में देवभूमि हिमाचल प्रदेश को खेल भूमि बनाने का ख्वाब पूरा होता नहीं दिख रहा है। आधारभूत ढांचे की कमी से प्रदेश के कई खिलाड़ी अन्य राज्यों में जाकर प्रशिक्षण लेने को मजबूर हैं। स्कूल स्तर पर खेलों की अनदेखी होने से छोटी उम्र में ही खिलाड़ी भी तैयार नहीं हो पा रहे हैं। अब 19 वर्ष बाद बन रही हिमाचल की नई खेल नीति पर खेल गतिविधियों को संजीवनी मिलने की आस जगी है।
प्रदेश के अधिकांश नामी खिलाड़ी अन्य राज्यों में प्रशिक्षण ले रहे हैं। ओलंपिक से लेकर अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की कई खेल प्रतियोगिताओं में शामिल होने वाले हिमाचल के खिलाड़ियों ने दूसरे राज्यों का रुख कर लिया है। हॉकी का शिमला के शिलारू में एस्ट्रो टर्फ है लेकिन स्पोर्ट्स अथारिटी ऑफ इंडिया के तहत होने के चलते प्रदेश के खिलाड़ियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में प्रदेश का एकमात्र एस्ट्रो टर्फ ऊना में ही है जहां प्रदेश के हॉकी खिलाड़ियों को खेलने का मौका मिल पा रहा है।
अन्य जिलों में एस्ट्रो टर्फ न होने से हॉकी खिलाड़ियों को बड़े स्तर का एक्सपोजर नहीं मिल पा रहा है। शूटिंग के प्रति भी प्रदेश के खिलाड़ियों में काफी रुझान है लेकिन उच्च स्तर की शूटिंग रेंज नहीं होने से इन खिलाड़ियों को बाहरी राज्यों में जाकर प्रशिक्षण लेना पड़ रहा है। फुटबॉल को लेकर बेशक प्रदेश में बहुत अधिक क्रेज नहीं है पर जो खिलाड़ी फुटबॉल खेलना चाहते हैं। उन्हें भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही है।
बॉक्सिंग, रेसलिंग, वॉलीवॉल, बास्केटबॉल और कबड्डी का भी प्रदेश में यही हाल है। इसके अलावा खेल विभाग के पास कई प्रशिक्षकों की भी कमी चल रही है। अब विभाग ने प्रशिक्षकों की भर्ती के लिए भर्ती एवं पदोन्नति नियम बनाने शुरू कर दिए हैं। जल्द ही यह भर्ती शुरू हो सकती है। उधर, प्रदेश की नई खेल नीति में इन सभी कमियों को दूर करने का सरकार प्रयास कर रही हैं। अनुराग ठाकुर के केंद्रीय खेल मंत्री बनने से भी प्रदेश में खेलों के दिन बदलेंगे। इसकी उम्मीद प्रबल है।