पिछले नगर निगम चुनाव में शिमला को महापौर और उप महापौर देने वाली माकपा इस बार महज एक सीट पर सिमट गई। पार्टी ने इस बार कुल 20 धुरंधर मैदान में उतारे थे जिनमें से 19 को हार का सामना करना पड़ा। सिर्फ समरहिल सीट पर ही माकपा की शैली शर्मा जीत हासिल करने में कामयाब रही।
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मगर बाकी वार्डों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। माकपा अपनी कैथू सीट को बचाने में भी कामयाब नहीं हो सकी और पूर्व पार्षद कांता सुयाल को हार देखनी पड़ी। छह सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही।
पिछले चुनावों में माकपा ने मेयर और डिप्टी मेयर समेत कुल पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। नगर निगम में पांच साल काम करने के बाद पार्टी दावा कर रही थी कि इस बार सीटों की संख्या 10 तक पहुंच जाएगी। मगर ऐसा नहीं हो पाया।
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पार्टी ने मानी हार, बताई ये वजह
पार्टी के राज्य सचिवालय सदस्य ओंकार शाद ने कहा कि पार्टी के खराब प्रदर्शन के कई कारण रहे। कहा कि संगठनात्मक कमजोरी और भाजपा व कांग्रेस पार्षदों के मेयर व डिप्टी मेयर के खिलाफ किए गए प्रचार के चलते यह हार झेलनी पड़ी। उन्होंने सभी विजेताओं का बधाई दी और कहा कि उनकी पार्टी का सहयोग नगर निगम को मिलता रहेगा।
किसी को समर्थन नहीं देगी माकपा
पार्टी ने साफ किया है कि वह इन चुनावों में किसी को समर्थन नहीं देगी। पार्टी ने एक सीट जीती है। चुनाव से पहले भी माकपा ने किसी को समर्थन न देने का दावा किया था। पार्टी सचिव ओंकार शाद ने कहा कि हम किसी को समर्थन नहीं दे रहे।
पूर्व महापौर बोले, हार पर आत्ममंथन करेंगे
नगर निगम शिमला के पूर्व मेयर संजय चौहान
- फोटो : File Photo
पूव महापौर संजय चौहान ने माना कि चुनाव में उनकी हार हुई है जिस पर आत्ममंथन होगा। कहा कि हमें पिछले चुनाव में दो सीटें मिली थी तो इस बार एक।
हम वहीं पर है। मगर मोदी लहर और वीरभद्र लहर भी इस चुनाव में नहीं दिखी जैसे दावे हो रहे थे। अगर चुनाव पार्टी सिंबल और डायरेक्ट होते तो नतीजे कुछ और होते।
ये रहे माकपा की हार के 5 बड़े कारण
-शहर में पानी की नियमित सप्लाई देने में नगर निगम नाकाम रहा। मेयर-डिप्टी मेयर के 24 घंटे पानी देने के दावे फेल रहे। हालांकि, इसके लिए पूरा हाउस जिम्मेदार था मगर जनता ने प्रमुख पदों पर बैठे मेयर-डिप्टी मेयर को इसका मुख्य जिम्मेदार माना।
-शिमला में गंदे पानी की सप्लाई हुई जिससे सैंकड़ों लोग पीलिया की चपेट में आए। अश्वनी खड्ड से गंदे पानी की सप्लाई रोकने में देरी हुई। हांलाकि मामले में एफआईआर कराने में माकपा का अहम रोल रहा लेकिन लोगों ने पूछा कि ये कदम समय रहते क्यों नहीं उठाया गया।
-चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और कांग्रेस के निशाने पर माकपा के महापौर और उप महापौर रहे। हर उस काम के लिए इन्हें जिम्मेदार बताया गया जो पार्षद नहीं कर पाए। इससे जनता में संदेश गया कि माकपा काम नहीं कर पा रही।
-पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी भी हार की वजह बनी। पार्टी न तो जनता को रिझाने के लिए अपने पिछले कार्यों का प्रचार कर पाई और न ही विरोधियों द्वारा किए जा रहे प्रचार का जवाब दे सकी। हर वार्ड में पहुंचने में पार्टी नाकाम रही।
-हार का एक कारण यह भी था कि माकपा कई वार्डों में अपने मजबूत उम्मीदवार ही खड़े नहीं कर पाई। एक वार्ड में जीत मिली तो छह में दूसरे नंबर पर रही। बाकी 13 सीटों पर माकपा उम्मीदवारों को काफी कम वोट मिले।