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Natural Disasters: हिमाचल के 45 फीसदी से अधिक क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा, अध्ययन में खुलासा

Thu, 20 Feb 2025 12:07 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

प्रदेश का 45 फीसदी से अधिक क्षेत्र बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 
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हिमाचल में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश का 45 फीसदी से अधिक क्षेत्र बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। खड़ी पहाड़ी के ढलान और तीन हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे अधिक खतरे में हैं। यह जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रोपड़ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आई है जो एसोसिएट प्रोफेसर रीत कमल तिवारी के नेतृत्व में किया गया है। इसके नतीजे स्प्रिंगर नेचर लिंक जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने हिमालयी राज्यों में विभिन्न प्राकृतिक खतरों का मूल्यांकन किया और पूरे राज्य में खतरे की पहचान करने के लिए मानचित्र तैयार किए।

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अध्ययन का उद्देश्य जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर आपदा प्रबंधन की बेहतर रणनीतियां विकसित करना है। अध्ययन के दौरान स्थानीय आंखों का विश्लेषण कर कर ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) आधारित मैपिंग का इस्तेमाल किया गया। इस तकनीक से भूमि, पानी, और अन्य प्राकृतिक चीजों के बारे में जानकारी एकत्रित करके नक्शे बनाए जाते हैं। अध्ययन के दौरान तैयार किए गए नक्शे दिखाते हैं कि बाढ़ और भूस्खलन वाले इलाके आमतौर पर निचली ऊंचाई वाली नदी घाटियों में होते हैं, जबकि ऊंचे पहाड़ों पर हिमस्खलन का खतरा अधिक होता है।

इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा खतरा
शोध के अनुसार 1,600 मीटर तक की ऊंचाई वाले इलाके और 5.9 से 16.4 डिग्री के बीच ढलान वाले क्षेत्र भूस्खलन और बाढ़ की चपेट में अधिक आते हैं।16.8 से 41.5 डिग्री के बीच के तीव्र ढलान और अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाके हिमस्खलन और भूस्खलन दोनों के लिए संवेदनशील हैं। नदी घाटियों में बाढ़ और भूस्खलन अधिक होते हैं, जबकि अत्यधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों में हिमस्खलन का जोखिम ज्यादा होता है। खड़ी पहाड़ी वाले ढलान और 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे अधिक खतरे में हैं।
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प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंध
शोध में यह भी बताया गया कि एक प्रकार की प्राकृतिक आपदा किसी अन्य आपदा को जन्म दे सकती है। इसलिए आपदा प्रबंधन और जोखिम न्यूनीकरण की रणनीतियों में सुधार के लिए इस तरह के अध्ययनों का विशेष महत्व है। उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में भी इसी तरह की प्राकृतिक आपदाओं की संवेदनशीलता का मूल्यांकन किया जा रहा है ताकि वहां के लिए भी प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियां विकसित की जा सकें।
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