कसुम्पटी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक अनिरुद्ध सिंह ने धर्मशाला को हिमाचल की दूसरी राजधानी बनाए जाने का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि राजधानी बनाए जाने से शिमला से कई दफ्तर धर्मशाला शिफ्ट हो सकते हैं इससे शिमला जिले की जनता को सफर करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इसका सबसे ज्यादा असर सोलन, सिरमौर और शिमला जिलों के लोगों पर पड़ेगा।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने धर्मशाला को हिमाचल की दूसरी राजधानी घोषित किया है। मंत्रिमंडल की बैठक से मंजूरी मिलने के बाद शिमला के लोग इसका विरोध करने लगे हैं। उन्हें चिंता सताई जा रही है कि एक के बाद एक कार्यालय धर्मशाला शिफ्ट हो जाएंगे। लोगों को छोटे छोटे कार्य के लिए धर्मशाला जाना पड़ सकता है।
भाजपा विधायक सुरेश भारद्वाज भी कर चुके हैं विरोध
स्थानीय विधायक सुरेश भारद्वाज भी धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाए जाने का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से एक राजधानी तो संभाली नहीं जाती। अब मंत्रिमंडल से दूसरे राजधानी बनाने की घोषणा कर दी है।
धर्मशाला में दूसरी राजधानी का औचित्य नहीं: बालनाटाह
रोहडू के पूर्व विधायक खुशी राम बालनाटाह ने कहा है कि धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाए जाने से क्षेत्रीय में टकराव बढ़ेगा। मुख्यमंत्री का यह कहना कि उस क्षेत्र की जनता को लाभ देने के लिए यह निर्णय लिया है। यह बिल्कुल हास्यास्पद है। अंग्रेजों के राज में जब सारे देश की राजधानी शिमला थी, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के सभी प्रांत इसी राजधानी से शासित होते थे तब देश के
किसी कोने से भी इसका विरोध नहीं हुआ था, लेकिन आज जब शिमला से 6 घंटों में धर्मशाला पहुंच सकते हैं तो दूसरी राजधानी का औचित्य क्या है। बालनाटाह ने कहा कि जिस छोटे से प्रदेश पर 40,000 करोड़ रुपये से ऊपर का कर्जा हो और हर वर्ष सैकड़ों करोड़ का अनुत्पादक खर्च बढ़ रहा हो, ऐसे में दूसरी राजधानी का निर्णय प्रदेश हित में नहीं बल्कि आगामी विधान सभा चुनावों को ध्यान में रख कर लिया गया निर्णय है।
बालनाटाह ने आरोप लगाया कि वीरभद्र सरकार सारा समय मंत्रियों और विधायकों के आपसी टकराव में ही बीत गया है। इसलिए जनता को भ्रमित करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि सरकार बेरोजगारी दूर करने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने जैसी समस्याओं पर पूरी तरह विफ ल रही है।
बालनाटाह ने कहा कि लंबे समय के पश्चात सभी प्रदेशवासियों के सहयोग से नया-पुराना हिमाचल नीचे - ऊपर का हिमाचल जैसे जुमलों को भुलाकर सभी सौहार्दता के साथ प्रदेश में रह रहे है, लेकिन यह निर्णय दुर्भाग्य पूर्ण है जिस जनहित में वापिस लिया जाए।