मलेरिया से पीड़ित रोगियों को दी वाली एकमात्र प्रीमाक्विन दवा हिमाचल में नहीं मिल रही है। सरकारी अस्पतालों में मुफ्त मिलने वाली इस दवा का स्टाक खत्म हो गया है। निजी दवा की दुकानों में भी ढूंढे नहीं मिल रही है। निजी केमिस्ट तर्क दे रहे हैं कि सरकार की तरफ से अस्पतालों में दवा मुफ्त दी जाती है, इसलिए उनके पास डिमांड नहीं आती।
मलेरिया की इस दवा का कोई विकल्प नहीं है। लिहाजा, जानलेवा मलेरिया से बचाने वाली एकमात्र दवा की तत्काल आवश्यकता रोगियों को परेशानी में डाल रही है। ठंडा प्रदेश होने से हिमाचल में मलेरिया के केस कम आते हैं, लेकिन पंजाब और हरियाणा के साथ सटे अधिकांश क्षेत्र मलेरिया के हिसाब से काफी संवेदनशील हैं।
सोलन में नहीं मिली दवा
सोलन के अर्की निवासी रमेश ने बताया कि टेस्ट की रिपोर्ट में मलेरिया पाजिटिव निकला। सोलन में किसी भी सरकारी अस्पताल में दवा नहीं मिली। शिमला के एक दवा विक्रेता ने बाहरी राज्य से बड़ी मुश्किल से इस दवा को मंगवाया।
हरियाणा से मंगवाई दवा
परवाणू के मृणाल सहाय ने बताया कि उसे मलेरिया पाजिटिव निकला। लेकिन सरकारी अस्पतालों में कहीं दवा नहीं मिली। हिमाचल में हर जगह भटकने के बाद हरियाणा के पंचकूला से दवाई खरीदकर लानी पड़ी।
जानलेवा हो सकता है मलेरिया
डा संजय अग्रवाल के मुताबिक मलेरिया एक जानलेवा रोग है। खास एनोफे लीज मच्छर की वजह से मलेरिया के कीटाणु मनुष्य के शरीर में दाखिल होते हैं। संक्रमण तेजी से फैलता है। समय पर इलाज न मिलना घातक हो सकता है।
कीटाणु लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके मनुष्य के ह्दय तक पहुंचने वाले खून को विषैला कर देते हैं, जिससे जान जा सकती है। 14 दिन तक लगातार प्रीमाक्विन दवा देने से रोगी ठीक हो जाता है। वैज्ञानिक फिलहाल इस बीमारी के लिए टीका खोजने में लगे हैं।
स्वास्थ्य निदेशक डीएस गुरंग का कहना है कि हिमाचल में मलेरिया के काफी कम मामले आते हैं। सभी जिला मुख्यालयों से डिमांड मंगवाकर दवा जल्द उपलब्ध करवाई जाएगी। बजट की कोई कमी नहीं है। संबंधित सीएमओ को चाहिए कि वे समय पर इसकी डिमांड भेजें।