वर्ष 1987 को हिमाचल सरकार ने ट्रस्ट का गठन कर दियोटसिद्ध मंदिर की तमाम संपत्ति का अधिग्रहण कर लिया था। जिसमें मंदिर के महंतों की गुरु गद्दी से चली आ रही परपंरागत जमीनों के मालिकाना हक से भी महरूम कर दिया गया। इससे भी एक कदम बढ़कर महंतों को उनके प्राचीन परपंरागत धार्मिक रुतबे से बेदखल कर दिया गया था।
महंतों को ट्रस्ट में स्थान तक नहीं दिया गया था। इस फैसले से नाराज महंतों ने मालिकाना हक के लिए न्यायालय में चुनौती दी। उधर, मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन विशाल शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बारे में सुना है, लेकिन अभी तक उनके पास ऑर्डर की कॉपी नहीं पहुंची है।
मंदिर ट्रस्ट से प्राप्त होने वाली आमदनी को मंदिर के विकास कार्यों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर सही तरीके से खर्च नहीं करने पर महंत को आपत्ति थी। अकसर देखा गया है कि चढ़ावे की राशि को मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की बजाय सरकारी वाहनों समेत अन्य पर अधिक खर्च हो रही है। जबकि एक्ट के तहत चढ़ावे को मंदिर पर ही खर्च किया जा सकता है।