लोकसभा चुनाव के लिए काउंट डाउन शुरू हो चुका है। चुनाव प्रचार के लिए राजनीतिक दलों ने ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग ने भी अब हाईटेक प्रणाली अपनाई है। आजादी से लेकर अब तक हुए चुनावों में भारी बदलाव देखा जा सकता है। जिले के बुजुर्गों का कहना है कि एक जमाना था जब 20 से 30 किलोमीटर दूर पैदल चलकर लोग वोट डालने के लिए जाते थे।
मतदान केंद्र दूर-दूर होते थे। इस वजह से मतदान भी बहुत कम होता था। वहीं, मतदाताओं की पहचान मौखिक तौर पर ही होती थी। 72 वर्षीय सेवानिवृत्त अध्यापक किशन सिंह गतवाल ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में लोकसभा चुनाव को लेकर उनके समय में इतना शोर नहीं होता था। जागरूकता के अभाव में ग्रामीण वोट देने नहीं जाते थे। हर घर से इक्का-दुक्का सदस्य ही वोट डालने जा पाते थे।
पहले पहचान पत्र न होने के कारण मतदाता की पहचान मौखिक तौर पर की जाती थी। आशंका होने पर वोटर को उसके परिवार के बारे में पूछा जाता था। बूथ कई किलोमीटर दूर होते थे। हीरापुर टोहाना निवासी 70 वर्षीय मनजीत सिंह ने बताया कि गांव में जागरूकता की बहुत कमी थी। लोग लोकसभा के वोट डालना उचित नहीं समझते थे। खेतीबाड़ी में मशगूल कई किसानों को यह भी जानकारी नहीं होती थी कि उनका सांसद कौन है।
हालांकि, स्थानीय निकाय और विधानसभा के चुनाव को लेकर ग्रामीणों में ज्यादा रुचि होती थी। 83 वर्षीय सुरेंद्र शर्मा पिछले 40 सालों से सतौन में मेकेनिक का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले और अब के चुनाव में जमीन-आसमान का अंतर है। यहां तो उंगली में लगने वाली स्याही में भी भारी बदलाव आया है। अब की स्याही पहले की अपेक्षा ज्यादा मजबूत है।