लेकिन ऐसे कथित ‘प्रचार’ वाहन दिन भर कितने किलोमीटर चलते हैं और कितना तेल इनमें खपता है, इसके खर्च को लेकर वह मौन है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के निजी वाहनों को प्रचार वाहन की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता।
हालांकि, वाहन में लगे बैनर का खर्च जरूर पार्टी के खर्च में जोड़ा जा सकता है। प्रदेश निर्वाचन कार्यालय के अधिकारियों ने कहा कि सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों के अधीन गठित टीमें ऐेसे वाहनों पर नजर रख रही है। इनके रिकार्ड बनाकर पार्टियों के खर्च में जोड़ा जा रहा है।
क्या कहता है नियम
नियम के अनुसार अगर किसी प्रत्याशी का फोटो या नाम किसी बैनर या पोस्टर में लगा होता है तो उसका खर्च प्रत्याशी के खर्च में जुड़ जाता है। जबकि सिर्फ पार्टी या प्रदेश अथवा राष्ट्रीय स्तर के किसी नेता के नाम पर प्रचार हो तो वह पार्टी के खर्च में जुड़ता है।
प्रत्याशी के लिए 70 लाख रुपये की लिमिट आयोग ने चुनावी खर्च के लिए तय की है लेकिन यह लिमिट नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही लागू होगी। जबकि पार्टी के खर्च की कोई लिमिट चुनाव आयोग ने तय नहीं की है।