देश में लॉकडाउन ने बेशक आम आदमी की मुश्किलें बढ़ाई हैं, लेकिन इस अवधि में पर्यावरण की दशा और दिशा बदल गई है। शहर से लेकर गांवों तक आबोहवा बदल गई है। नदी, नालों का पानी नीला हो गया है। हवा में घुल रहा जहर काफी मात्रा में कम हो गया है। हिमाचल के कई जिलों में मौसम का रुख ही बदल गया है। कभी गर्मी से तपने वाले स्थानों पर आजकल ठंड का अहसास हो रहा है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार बारिश भी अधिक हो रही है। पर्यावरणविद् इसकी वजह लॉकडाउन को मान रहे हैं। इनकी मानें तो इन दो महीनों में सब कुछ बदल गया है। हवा में नयापन लग रहा है। पानी साफ हो गया है। कई प्रजातियों के पक्षियों ने हिमाचल में दस्तक दी है। कई शहरों में प्रदूषण की मात्रा काफी कम हो गई है।
कांगड़ा में सुधरी नदी-नालों और वायु की दशा
कांगड़ा में 23 मार्च से चले लॉकडाउन का असर अब जिले के पर्यावरण पर भी देखने को मिला है। लॉकडाउन के कारण न तो वाहन चले और न ही लोगों का कूड़ा-कचरा साथ लगते नदी-नालों में गिरा। इसके चलते जहां जिला की हवा साफ हुई है, वहीं नदी-नालों का पानी भी पूूरी तरह से साफ हो गया है। साथ ही पेड़-पौधों पर वाहनों के चलने न चलने धूल आदि नहीं पड़ी, जिसके चलते इन पेड़ों की उम्र में भी इजाफा हुआ है। लॉकडाउन के कारण इस बार लोगों जंगलों का आदि का रुख भी नहीं कर सके, जिसके चलते फायर सीजन होने के बावजूद इस बार वनों में आगजनी की घटना कम ही देखने को मिली हैं। पूर्व में इन दिनों में पर्यटन सीजन पूरे चरम पर होता था, जिसके चलते वाहनों के धुएं और पर्यटकों की ओर से नदी-नालों में काफी गंदगी फैलाई जाती थी।
सिरमौर की आबोहवा से गायब हुए जहरीले कण
लॉकडाउन के 70 दिनों की अवधि में सिरमौर की आबोहवा स्वच्छ हो गई है। हवा से जहरीले कण गायब हो गए। अमूमन हवा में 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक रहने वाले कण (एयर क्वालिटी इंडेक्स) लॉकडाउन में 50 से 60 ही पाए गए।
मैदानी क्षेत्रों से भी पहाड़ और उन पर जमी बर्फ साफ नजर आ रही है। लॉकडाउन में हर तरफ साफ और स्वच्छ वातावरण नजर आने के साथ प्राकृतिक सुंदरता भी बढ़ गई है। पर्यावरणविदों का कहना है कि अच्छे वातावरण के कारण बीमारियों से भी निजात मिलेगी। इससे पहले वायु प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ गया था।
सिरमौर की हवा में घुल रहा था जहर
बीते साल की बात की जाए तो सिरमौर के मैदानी क्षेत्रों की आबोहवा में जहर घुल रहा था। कालाअंब क्षेत्र में धूलकण का स्तर 130-135 ओयूजी/एम3 था। वहीं, पांवटा सहित आसपास के अन्य क्षेत्रों का भी यही हाल था।
वैज्ञानिकों के अनुसार हवा में मिट्टी के कण 100 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर पार्टस से ज्यादा नहीं होने चाहिए। प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अधिशासी अभियंता एके शारदा ने बताया कि प्रदूषण के स्तर में 50 फीसदी से अधिक की कमी आंकी गई है। अब हवा काफी स्वच्छ हो गई है।
ब्यास में प्रदूषण की मात्रा हुई कम, रिवालसर झील साफ
रिवालसर झील
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लॉकडाउन के बीच छोटी काशी मंडी की जीवनदायनी ब्यास नदी में प्रदूषण की मात्रा कम हुई है। प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल पराशर झील का टीला शुद्धता के कारण घूमने लगा है। ऐसी मान्यता है कि यह टीला तभी घूूमता है जब वातावरण में शुद्धता हो। पराशर ऋषि की तपोस्थली में भी प्रदूषण की मात्रा अधिक होने के कारण कई चीजें बदली थी, लेकिन दो माह से अधिक समय के बंद के बाद अब यहां चीजें पुराने स्वरूप में नजर आने लगी हैं।
प्रसिद्ध पर्यटन स्थल धार्मिक त्रिवेणी के नाम से मशहूर रिवामसर झील खुद ब खुद साफ हो गई है। हर साल गर्मियों और बरसात में यहां लाखों की संख्या में मछलियां प्रदूषण से दम तोड़ती थी, लेकिन इस बार लॉकडाउन और कर्फ्यू के बंद के कारण यहां प्रदूषण नहीं फैला। डीएफओ एसएस कश्यप बताते हैं कि कोरोना महामारी के बीच लॉकडाउन से वनों को नई जिंदगी मिली है।
साइकिल पर या पैदल चल रहे लोग
वाहनों के सफर में कमी आई है। पैदल और साइकिल से आसपास की दूरी तय करने के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के प्रदूषण को लेकर रोजाना विश्लेषण में सामने आया कि लॉकडाउन की वजह से अब तक हवा में प्रदूषण का स्तर कुछ कम हुआ है। नाइट्रोजन ऑक्साइड के स्तर में भी कमी आई है।
लॉकडाउन से पर्यावरण और प्रकृति में आया निखार: नेगी
जिया लाल नेगी
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना महामारी के दौर में इस बार विश्व पर्यावरण के संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जो काम आज तक विश्व स्तर पर मिलकर बड़े-बड़े संगठन और समूह नहीं कर सके, वह काम कोरोना संक्रमण के चलते हो गया है। वन अधिकार समिति किन्नौर के अध्यक्ष जिया लाल नेगी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर कहा कि मनुष्य द्वारा प्रकृति को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जिससे हम विकास के नाम पर प्रकृतिक का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं।
इस पर लगाम लगी है। कोरोना महामारी के कारण परिवहन और प्रदूषण पैदा करने वाली फैक्टरियां बंद होने से पर्यावरण स्वच्छ हुआ है। जालंधर से धौलाधार की पहाड़ियां साफ देखी जा सकती हैं। मानव जाति को भी इससे आत्मनिर्भर बनने के लिए एक प्रेरणा मिली है और इस बात की सीख मिली है कि अपनी जीवनशैली को जितना प्रकृति के हिसाब से चलाएंगे, हमें उतना ही फायदा मिलेगा। नेगी ने कहा कि मनुष्य को विकास की अवधारणा के साथ-साथ अपनी जरूरतों को सीमित करने की आवश्यकता है।