पिछले 19 साल में सरकार के लाखों रुपये खर्च कर राज्य कला संस्कृति भाषा अकादमी ने बड़ी संख्या में किताबें छापीं, मगर ये अपने स्टोर में दीमक के लिए सजा दीं। अकादमी कई तरह की पुस्तकें छापती रही, मगर इन्हें आगे बेचने के बजाय स्टोर में जमा किया जाता रहा। राज्य सरकार के स्थानीय लेखा परीक्षा विभाग ने जांच में इसका खुलासा किया है। इस महकमे के उपनिदेशक ज्ञान चंद शर्मा ने अपनी यह ऑडिट रिपोर्ट हाल ही में अगली कार्रवाई के लिए विशेष सचिव भाषा एवं संस्कृति विभाग को भेजी है।
एक अप्रैल 2016 से लेकर 31 मार्च 2018 के बीच के जिस कार्यकाल की यह ऑडिट रिपोर्ट सामने आई है, उस बीच अकादमी के सचिव अशोक हंस, प्रभा राजीव और डॉ. कर्म सिंह रहे हैं। राज्य सरकार इन अधिकारियों से जवाब तलब कर सकती है। लेखा परीक्षा जांच में यह पाया गया है कि मार्च 2018 तक अकादमी के स्टोर में 17,38,684 रुपये की किताबें पड़ी रहीं। इनमें वर्ष 1999 से लेकर वर्ष 2018 तक छपी पुस्तकें भी शामिल थीं। जांच में पाया गया है कि अकादमी ने इन बहुमूल्य किताबों को तो छपवाया, मगर इन्हें बेचने के लिए कुछ भी नहीं किया।
पहाड़ी गीतों की कैसेटें भी फांक रहीं धूल
जांच रिपोर्ट के अनुसार अकादमी ने वर्ष 2016-17 से 2017-18 के बीच पहाड़ी गीतों की किसी भी कैसेट की बिक्री नहीं की। अकादमी ने इसके लिए भी कोई प्रयास नहीं किए। 1,96,740 रुपये कीमत की ये कैसेटें भी धूल फांकती रहीं।
उधार में बांट दीं किताबें और कैसेटें
अकादमी ने 67 हजार रुपये की किताबें और कैसेेटें कई लोगों, फर्मों और कार्यालयों को उधार में बांट दीं, मगर इनके मूल्य की वसूली नहीं की। इनमें 50,998 रुपये की किताबें और 16,178 रुपये की कैसेटें हैं।
अकादमी अधिकारियों ने वित्तीय नियमों को तोड़ा
स्थानीय लेखा परीक्षा विभाग के उपनिदेशक ज्ञानचंद शर्मा ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश वित्तीय नियम भाग-एक की धारा 15.2(1) के अनुसार किसी भी संस्था को उतनी ही सामग्री पर पैसा खर्च करना होता है, जितना अनिवार्य हो। इससे संस्था की आय से अनियमित व्यय नहीं होगा। धारा 15.19 के अनुसार स्टोर में तय से अधिक सामग्री नहीं होनी चाहिए। यदि स्टोर में मांग से अधिक सामग्री रखी जाती है और उसका इस्तेमाल कई वर्षों से नहीं होता है तो इसे सरकारी धनराशि का अपव्यय माना जाएगा।