हिमाचल के जनजातीय जिला किन्नौर की हांगो पंचायत में गेहूं की कई पुरानी किस्मों में रोग प्रतिरोधी गुण मिलने के बाद अब सेब की किस्मों में भी यह गुण खोजे जाएंगे। क्षेत्र में सेब की पारंपरिक किस्मों में सेब के पौधों में लगने वाले रोगों से लड़ने वाले जीन की वैज्ञानिक जांच की जाएगी। इस क्षेत्र में सेब की भी अच्छी गुणवत्ता और पैदावार हो रही है। वैज्ञानिक अब जांचेंगे कि आखिर इस क्षेत्र में ऊगाई जा रही सेब की किस्मों में ऐसी क्या खास बात है कि इनमें बीमारियां कम लग रही हैं।
इसी उद्देश्य से हाल ही में हांगो पंचायत में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के वैज्ञानिकों और उद्यान विभाग के अधिकारियों की सहभागिता में वैज्ञानिक संवाद शिविर भी लगाया गया है। विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004-05 में हांगो की स्थानीय गेहूं की कई किस्मों के बीजों पर अध्ययन किया गया था। इसमें गेहूं की स्थानीय किस्मों में भूरा रतुआ और काला रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी गुण पाए गए। अध्ययनों में इस गेहूं की आनुवंशिक सामग्री से जुड़े रोग प्रतिरोधी जीनों की पहचान हुई है। गेहूं में एलआर-80 और एसआर-65 जैसे जीन शामिल हैं।
गेहूं में रोग प्रतिरोधी गुण मिलने के बाद अब इसी दृष्टिकोण से हांगो और आसपास के क्षेत्रों में मौजूद पुरानी सेब किस्मों की तलाश की जाएगी। इन किस्मों की पहचान कर उनके पौधों और फलों के गुणों का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। चयनित पौधों को वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से आगे रोग परीक्षण और आनुवंशिक जांच के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
किसी स्थानीय किस्म में रोग प्रतिरोध से जुड़े उपयोगी गुण प्रमाणित होते हैं तो भविष्य में उनका उपयोग नई और बेहतर सेब किस्में तैयार करने में किया जा सकता है। क्षेत्र में सेब की गुणवत्ता काफी अच्छी है। बीमारियों की भी कम ही शिकायतें हैं।