आरबीआई की गाइडलाइंस के अनुसार किसी भी बैंक का एनपीए अगर 10 फीसदी से ऊपर चला जाए तो उसकी सेहत खतरे में होती है। वर्तमान में बैंक का एनपीए 14.6 फीसदी है। इसका अर्थ यह है कि 100 में 14 लोन एनपीए यानी खतरे की स्थिति में हैं।
नाम न छापने की शर्त पर कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों ने बताया कि असल में बैंक का एनपीए 20 फीसदी से ज्यादा पहुंच चुका है। लेकिन, तथ्यों को छिपाकर बैंक वर्तमान में करीब 14.6 फीसदी एनपीए दिखा रहा है। एनपीए को कम दिखाने के लिए बैंक ने कई ऋण इसमें शामिल ही नहीं किए हैं।
ऐसा अपनी कमियों को छिपाकर आरबीआई और नाबार्ड के समक्ष छवि बेहतर दिखाने के लिए किया जा रहा है। वर्तमान में एनपीए में जा चुके 40 फीसदी ऋण करोड़ों का लोन लेने वाले डिफॉल्टरों के हैं।
उधर, केसीसी बैंक के एमडी पीसी अकेला ने कहा कि बैंक की सेहत अच्छी है। एनपीए और ओवर ड्यूज में अंतर है। जरूरी नहीं कि एनपीए घटने के दौरान ओवर ड्यूज भी घटे। ओवर ड्यूज घटता-बढ़ता रहता है।
बैंकों में एनपीए का अर्थ है कि नॉन प्रफॉरमिंग एसेट यानी कुछ ऋण वापस नहीं आ रहे हैं। अब इन ऋणों से बैंक को कोई आमदन नहीं होगी। ऋण की रिकवरी पसोपेश में पड़ गई है।
जब किसी ऋणदाता की तीन से ज्यादा किश्तें लंबित हो जाएं तो उस ऋण को एनपीए में दर्शा दिया जाता है। वहीं, बैंक ने अपने ऋणदाताओं से कितना पैसा लेना है इसके लिए ओवर ड्यूज का डाटा रखा जाता है। यानी, ऋणों की सभी बकाया किश्तें ओवर ड्यूज के अंतर्गत दर्शाई जाती हैं।
राजनीतिक नियुक्तियों से बिगड़ी बैंक की सेहत
बैंक की खराब सेहत की असली जड़ राजनीति को माना जा रहा है। नॉन बैंकिंग क्षेत्र से संबंध रखने वाले एमडी और चेयरमैन बैंक को चला रहे हैं। अन्य बैंकों में एमडी और चेयरमैन बैंकिंग क्षेत्र के ही होते हैं।
महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली बीओडी के अधिकतर सदस्य राजनीतिक क्षेत्र के होते हैं। यही सदस्य राजनीतिक प्रभाव वाले व्यक्ति को चेयरमैन चुनते हैं। राजनीतिक प्रभाव की वजह से कई बार गलत ऋणों का आवंटन कर दिया जाता है जो बाद में गले की फांस बन जाते हैं।
कुछ अधिकारी और कर्मचारी को पदोन्नति का लालच तो कुछेक को ट्रांसफर का डर दिखाकर गलत ऋण आवंटित करवाए जाते हैं। राजनीतिक प्रभाव के चलते रिकवरी प्रक्रिया में भी बाधा आती है।