वीरवार को न बच्चे सुबह उठकर स्कूल गए न रोज की तरह मवेशियों को चारा मिल पाया। खेत और बाग-बगीचे भी किसानों-बागवानों की राह देखते रहे। गांव इस अनचाहे त्रासद बदलाव से कब तक उबर पाएगा, फिलहाल कहना मुश्किल है।
पीड़ित परिवारों को अब मकान के साथ-साथ रोटी और कपड़े की चिंता सताने लगी है। हालांकि, उनकी सुध लेने रिश्तेदार पहुंच रहे हैं और गांव के बचे घरों से भी मदद मिल रही है। बावजूद इसके आने वाले कल में क्या होगा, यह चिंता प्रभावित परिवाराें को खाए जा रही है।
कशैणी गांव के राजिंद्र और नैना जनारथा अपनी बेटी की शादी की तैयारी कर रहे थे। घर में बेटी की शादी के लिए जेवर, कपड़े सहित लाखों का सामान घर में जमा किया हुआ था।
बुधवार सुबह के समय आग लगने के बाद पांव में पहनने के लिए बूट तक नहीं बचा सका। पुश्तैनी संपत्ति के साथ घर में बेटी की विदाई के लिए जुटाया गया सामान भी आग की भेंट चढ़ गया।
अब परिवार को दो वक्त की रोटी की चिंता सता रही है। बेटी की विदाई के लिए पिता को अब दूसरों के सामने हाथ पसारने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गांव के लोगों ने सीएम से भी बेटी की शादी के लिए सहयोग की अपील की है।