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Kargil Vijay Diwas: ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर पहुंचे कारगिल, 18 ग्रनेडियर के साथ टाइगर हिल पर लहराई थी विजय पताका

Wed, 26 Jul 2023 10:11 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी/मनाली (कुल्लू)

सार

ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर के नेतृत्व में टाइगर हिल पर भारतीय सेना ने तिरंगा लहराया था। अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि इस लड़ाई में हिमाचल के 52 वीर शहीद हुए। 
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कारगिल में थल सेना अध्यक्ष जनरल मनोज पांडे से मिले कारगिल में ब्रिगेडियर खुशाल - फोटो : संवाद
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विस्तार
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कारगिल युद्ध के हीरो ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर 24वें कारगिल विजय दिवस के मौके पर कारगिल में पहुंच गए हैं और वह आज इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। उनके नेतृत्व में टाइगर हिल पर भारतीय सेना ने तिरंगा लहराया था। अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि इस लड़ाई में हिमाचल के 52 वीर शहीद हुए। हिंदुस्तान के 527 रणबांकुरों ने देश के लिए प्राणों की आहुति दी। आज भी उस घटनाक्रम को याद करता हूं तो रोमांच और साहस से भर जाता हूं। कारगिल युद्ध की यादें मुझे आज भी प्रेरित करती हैं। इसी का परिणाम था कि यूनिट के हवलदार योगेंद्र यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया जबकि एक अन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट बलवान सिंह को महावीर चक्र मिला।

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18 ग्रेनडियर के साथ लड़ी लड़ाई
ब्रिगेडियार खुशाल ने कहा कि कारगिल युद्ध में मेरे पास 18 ग्रेनडियर की कमान की थी। तोलोलिंग पर दुश्मन के साथ संघर्ष चल रहा था, उस दृश्य को याद करूं तो कारगिल का युद्ध इतना कठिन था और वहां आड़ लेने के लिए भी खाली व सूखी पहाड़ियों के अलावा तिनका तक भी नहीं था। बताया कि रात का समय था हमने पाकिस्तान की मशीनगन पोस्ट पर हमला किया, तो उस लड़ाई में मेरे नौ जवान शहीद हुए। इसमें कर्नल विश्वनाथन भी थे। इन्हें भी एक गोली लगी और बड़ी मुश्किल से इन्हें खींच कर नीचे लाए व एक पत्थर के नीचे ले गए। खून बह रहा था लेकिन मैं इन्हें सहला रहा था। रौशनी का न तो कोई प्रबंध था न ही रौशनी जला सकते थे यह भी कारण था कि विश्वनाथन को वह प्राथमिक उपचार नहीं मिल सका जो हम उन्हें दे सकते थे इसका कारण यह भी था कि सामने से गोलियों की बौछारें हो रही थी।

इन्होंने अंतिम सांसे मेरी ही गोद में ली और वीरगति को प्राप्त हुए। इन्हें इनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस हमले में मैं भी इनके साथ में था और जब दोनों तरफ़ से गोलियों व गोलों से जोरदार हमला हो रहा था तो मेरे आगे सूबेदार रणधीर सिंह थे, विश्वनाथन को जब गोली लगी तो मैंने सूबेदार रणधीर सिंह को बोला कि आगे बढ़ें और इन्हें (विश्वनाथन) पीछे खींचे तथा आप आगे बढ़ें लेकिन तभी देखा कि सूबेदार रणधीर को भी गोली लग चुकी है और ये भी शहीद हो चुके थे। हम बिलकुल साथ-साथ आगे सरक रहे थे। इसी तरह मेरे एक हवलदार राम कुमार थे जो रेडियो आपरेटर थे उनका हैंडसेट मेरे हाथ में था और ये मेरे पीछे थे मैंने देखा कि हैंडसेट मुझे पीछे खींच रहा है आगे नहीं आ रहा जबकि रणधीर शहीद हो चुका है लेकिन मैं आगे नहीं बढ़ रहा हूं तब पीछे मुडकर देखा तो पाया कि हवलदार राम कुमार भी शहीद हो चुका है।
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एक एक करके कई हो रहे थे शहीद
कारगिल हीरो खुशाल ने बताया कि इसी तरह एक मेजर राजेश अधिकारी थे जिनकी शादी को अभी छह माह ही हुए थे वे जब तोलोलिंग की लड़ाई में दुश्मन सैनिकों के साथ गुत्थमगुथा हो रहे थे तो मैं भी इनसे बात करना चाह रहा था लेकिन आपरेटर इन तक नहीं पहुंच पा रहा था ऑपरेटर ने कहा कि साहब बहुत गोलियां आ रही हैं इसलिए मैं आपकी बात मेजर साहब से नहीं करवा सकता। उसी समय जब इससे बात हो रही थी तो रेडियो सेट पर चीखने की जोरदार आवाज आई और पता लगा कि मेरे से बात करते-करते इस रेडियो ऑपरेटर को भी गोली लगी है तथा ये भी शहीद हो गया है। मेजर राजेश अधिकारी भी बहादुरी से संघर्ष करते हुए शहीद हो गए। उन्हें भी मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

दुश्मन के स्नाइपर फायर की नहीं होती थी आवाज
ब्रिगेडियर खुशाल बताते हैं कि यह लड़ाई इतनी भयानक थी कि जो दुश्मन के स्नाइपर फायर थे उनकी आवाज तक नहीं होती थी। एक जवान हवलदार विरेंद्र जो कि मुझे बता रहा था कि पाकिस्तान का फायर सामने से आ रहा है वह बचाव के लिए सचेत कर रहा था। हम तीन लोग थे मैं कर्नल विश्वनाथन और हवलदार विरेंद्र उसी क्षण स्नाइपर का फायर आया और विरेंद्र के माथे पर लगा और यह वहीं गिर गया हमें समझ ही नहीं आया कि यह कैसे गिर गया। तोलोलिंग की इतनी भयानक लड़ाई हमनें 22 दिन तक लड़ी। उसके बाद मेरी यूनिट ने द्रास सेक्टर की सबसे मुश्किल और मशहूर चोटी टाईगर हिल्स पर फतह हासिल की।

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सेना का लाइफ लाइन बन गया था मनाली-लेह मार्ग
 1999 में कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने में मनाली-लेह नेशनल हाईवे की अहम भूमिका रही। कारगिल युद्ध में यह मार्ग सेना की लाइफ लाइन बन गया था। इसी मार्ग से होकर भारतीय सेना के जवान कारगिल तक पहुंचे। रसद और खाद्य सामग्री भी इसी मार्ग से पहुंचाई गई। युद्ध के दौरान हर रोज भारतीय सेना के जवान इस मार्ग से होकर निकलते थे। सेना की कानवाई जब यहां से निकलती थी तो स्थानीय लोग जवानों का हौंसला बढ़ाने के लिए एकत्रित होते थे। शिक्षाविद सतीश सूद ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान मनाली क्षेत्र के लोग और महिलाएं सुबह करीब 6:00 बजे पलचान कर सेना के जवानों का हौसला बढ़ाते थे। गौरतलब है कि बीआरओ ने 2008 में मनाली-लेह मार्ग को डबललेन बनाने का कार्य शुरू किया था। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस मार्ग को इसलिए भी प्राथमिकता दी गई कि जम्मू-श्रीनगर-लेह की बजाय यह मार्ग दुश्मनों की नजर से कोसों दूर है। अटल टनल रोहतांग के बाद शिंकुला दर्रा पर टनल का निर्माण करने से मनाली-लेह मार्ग हर मौसम में खुला रह सकता है। बीआरओ मनाली-सरचू-लेह मार्ग के साथ-साथ मनाली-शिंकुला-पदुम-कारगिल-लेह मार्ग को भी वैकल्पिक मार्ग के रूप में तैयार करने जा रहा है।
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