प्रदेश हाईकोर्ट में चल रहे दागी अधिकारियों को संवेदनशील पदों से हटाने से जुड़े मामले में बताया गया कि आईजीएमसी शिमला में न्यूरो सर्जन की बतौर मेडिकल सुपरिंटेंडेंट तैनाती न तो जनहित में सही है और न ही मरीजों के। इनकी तैनाती के बाद से आईजीएमसी में अव्यवस्था का माहौल पैदा हो गया है।
एक डॉक्टर जिस पर सीनियर मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की मोहर के तहत फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी करने का आरोप है। उसके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की जा रही है। वैसे भी सर्जन जो सुपर स्पेशिएलिटी में माहिर होते हैं, उनकी तैनाती बतौर एमएस न तो मरीजों के हित में होती है और न ही जनहित में।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने स्वास्थ्य सचिव को आदेश दिए कि वह 2 सप्ताह के भीतर अपने निजी शपथपत्र से इसका स्पष्टीकरण दे। मामले पर सुनवाई 27 सितंबर को होगी।