शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज को जुब्बल-कोटखाई विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रभारी बनाने का कोर ग्रुप ने अप्रत्याशित फैसला लिया है। इससे प्रदेश भाजपा के एक खेमे में खलबली मच गई है। पिछले तीन साल में जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में सरकार और संगठन के कार्यों में सुरेश भारद्वाज लगातार दखल देते रहे हैं। इससे बरागटा परिवार से उनकी कई बार तनातनी हो चुकी है। अब इस चौंकाने वाले निर्णय ने नई सियासी हलचल पैदा कर दी है। सियासी विशेषज्ञों के मुताबिक अब दिवंगत पूर्व मंत्री नरेंद्र बरागटा के बेटे चेतन बरागटा को टिकट मिलने या इससे वंचित होने की दोनों ही स्थितियों में नए सियासी समीकरण बनेंगे।
बरागटा परिवार और उनके समर्थकों के साथ सामंजस्य बैठाने का गणित हल करना सुरेश भारद्वाज के लिए कड़ी चुनौती होगा। जयराम सरकार के इस कार्यकाल में शिमला जिला से दो बडे़ भाजपा नेता सुरेश भारद्वाज और दिवंगत नरेंद्र बरागटा ही रहे हैं। पर दोनों में सदा वर्चस्व की खींचतान रही है। मंत्री सुरेश भारद्वाज जुब्बल-कोटखाई से सटे रोहडू़ क्षेत्र के मूल निवासी हैं, लेकिन वह शिमला से ही चुनाव लड़ते हैं। शिमला शहर में चेतन बरागटा काफी सक्रिय रहते आए हैं। इससे भारद्वाज और उनके समर्थकों को आपत्ति रही है।
नरेंद्र बरागटा के जीते जी चेतन बरागटा का शिमला शहर में सक्रिय होने का अर्थ यह निकाला जाता रहा था कि वह यहां अपने लिए नई चुनावी पृष्ठभूमि बना रहे थे। हालांकि, अब हालात बदल गए हैं। दूसरी ओर जुब्बल-कोटखाई में कई छोटे-बडे़ मामलों में भारद्वाज के हस्तक्षेप की बरागटा परिवार ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर तक से इसकी शिकायत की है। इस पर नरेंद्र बरागटा और चेतन बरागटा मीडिया में भी कई बार मुखर हुए। उन पर जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में बड़ी संख्या में तबादले करवाने का आरोप लगाया। हाल ही में जुब्बल-कोटखाई नगर परिषद के भाजपा के हाथ से फिसलने पर भी बरागटा परिवार और सुरेश भारद्वाज में तनातनी रह चुकी है।
यद्यपि कोर ग्रुप के इस फैसले पर राजनीतिक पंडितों की गहरी नजर है कि इस तरह से जुब्बल-कोटखाई में नया पैंतरा चलाकर भाजपा किसे टिकट देने जा रही है। पार्टी हर सूरत में इस सीट पर दोबारा काबिज होना चाहेगी। इसलिए भारद्वाज के साथ दो सह प्रभारी मंत्री लगाए गए हैं और समन्वयक पूर्व मंत्री, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल को नियुक्त किया गया है, जिनके पास हर जोड़-घटाव का पुराना अनुभव है।
भितरघात को रोकना होगा भाजपा के लिए चुनौती
जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र से पिछले कई दशकों से विधायक उसी पार्टी से बनते आ रहे हैं, जिसकी सरकार बनती है। वर्ष 2017 में नरेंद्र बरागटा विधायक बने तो इससे पिछले वर्ष 2012 के चुनाव में वह मंत्री रहते भी पूर्व मुख्यमंत्री रामलाल ठाकुर के पोते रोहित ठाकुर से हार गए थे। उस दौरान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। इससे पहले वर्ष 2007 में धूमल सरकार बनी तो उस वक्त भी नरेंद्र बरागटा ही रोहित ठाकुर को हराकर विधायक बनने के बाद मंत्री बने थे।
जुब्बल-कोटखाई में सत्ता के साथ बने रहने का यह क्रम इसी तरह से पिछले काफी वक्त से चला हुआ है। अब उपचुनाव हो रहे हैं तो देखना यह होगा कि इस बार यह मिथ टूटेगा कि बना रहेगा। जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में जहां रोहित ठाकुर पूरे दमखम से मैदान में होंगे, वहीं चेतन बरागटा के समानांतर भाजपा से भी टिकट के कई दावेदार सामने आएंगे। भाजपा को इस सीट पर मिशन रिपीट के लिए भितरघात को रोकना भी चुनौती होगा तो आम चुनाव से पहले आक्रामक कांग्रेस के लिए भी सत्तासीन भाजपा से भिड़ना आसान नहीं होगा।